मनीषा शर्मा। राजस्थान में डेक्स्ट्रोमेथोर्फन कफ सिरप से जुड़ा मामला लगातार गहराता जा रहा है। प्रदेश के कई जिलों में इस सिरप के सेवन से दो बच्चों की मौत हो चुकी है, जबकि अन्य कई बच्चे गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं। मामला सामने आने के बाद प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, खासकर इस बात को लेकर कि आखिर दिल्ली में बैन हो चुकी यह दवा राजस्थान में बच्चों को क्यों दी गई और इसकी रोकथाम समय रहते क्यों नहीं की गई।
बच्चों की मौत से उठे सवाल
पिछले कुछ दिनों में राजस्थान के कई जिलों से डेक्स्ट्रोमेथोर्फन कफ सिरप के साइड इफेक्ट की खबरें आई हैं। इनमें दो बच्चों की मौत ने पूरे प्रदेश को हिला दिया है। पीड़ित परिवारों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और सिरप वितरित करने वाली कंपनी पर त्वरित कार्रवाई नहीं की।
सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर यह दवा पहले से ही संदिग्ध थी और दिल्ली में इसे चार साल पहले ही बैन कर दिया गया था, तो राजस्थान में इसका वितरण कैसे किया गया। इतना ही नहीं, डॉक्टरों की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए हैं कि उन्होंने मरीजों को यह दवा क्यों एडवाइज की, जबकि इसकी सुरक्षा पर पहले से सवाल उठाए गए थे।
स्वास्थ्य मंत्री का बयान: “जल्दबाजी नहीं करेंगे”
इस मुद्दे पर अब राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींमसर की प्रतिक्रिया सामने आई है। वे जोधपुर पहुंचे और मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि मामले की जांच चल रही है और दवा के सैंपल लैब में भेजे गए हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा: “अभी कुछ भी कहना या करना जल्दबाजी होगी। जब तक लैब की रिपोर्ट सामने नहीं आती, तब तक यह कहना मुश्किल है कि बच्चों की मौत की असली वजह क्या थी। रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।” हालांकि, विपक्ष और जनप्रतिनिधि सरकार की इस प्रतिक्रिया को देरी और लापरवाही मान रहे हैं।
दवा कंपनी फरार, फैक्ट्री पर ताला
इस विवाद के बाद दवा बनाने वाली कंपनी केयसंस फार्मा चर्चा में आ गई है। बताया जा रहा है कि कंपनी की फैक्ट्री पर ताला जड़ दिया गया है। न वहां कोई मैनेजर मौजूद है और न ही मजदूर दिखाई दे रहे हैं। इससे यह आशंका और गहराती है कि कंपनी इस मामले से बचने की कोशिश कर रही है। इसके बावजूद अब तक कंपनी पर किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं की गई है। यही वजह है कि लोगों का गुस्सा और भी बढ़ गया है।
दिल्ली में बैन, राजस्थान में वितरण क्यों?
डेक्स्ट्रोमेथोर्फन कफ सिरप को दिल्ली सरकार ने चार साल पहले ही बैन कर दिया था। उस समय यह दवा बच्चों के लिए खतरनाक मानी गई थी और इसके सेवन से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई थी। हालांकि, यह नोटिस केवल दिल्ली के लिए ही लागू था और अन्य राज्यों तक इसकी सूचना नहीं पहुंचाई गई। यही वजह रही कि राजस्थान जैसे राज्यों में यह सिरप खुलेआम बांटा और बेचा जाता रहा। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में केवल सरकार ही नहीं बल्कि डॉक्टरों और दवा कंपनियों की जिम्मेदारी भी बनती है। डॉक्टरों को बैन दवाओं की जानकारी रखनी चाहिए थी और उन्हें मरीजों को यह दवा एडवाइज नहीं करनी चाहिए थी।
कांग्रेस का हमला, सरकार पर उठाए सवाल
इस पूरे मामले में कांग्रेस ने प्रदेश सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि सरकार बच्चों की जान के मामले में भी संवेदनशील नहीं है। जिस दवा को दिल्ली में बैन किया गया, वह राजस्थान में कैसे बांटी जा रही थी? कांग्रेस ने सवाल उठाया कि कंपनी पर तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की गई और आज तक दवा के वितरण की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई। पार्टी का कहना है कि सरकार की इस लापरवाही से बच्चों की जान गई है और इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
जनता में आक्रोश
इस घटना के बाद आमजन में गुस्सा है। लोगों का कहना है कि बच्चों की मौत जैसे गंभीर मामले में सरकार को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए थी। परिवारों ने आरोप लगाया कि बच्चों को सामान्य खांसी-जुकाम की शिकायत थी और उन्हें यह सिरप दिया गया, लेकिन इसके सेवन के बाद उनकी हालत बिगड़ती चली गई। लोगों का सवाल है कि आखिर सरकारी तंत्र इतने बड़े स्तर की लापरवाही कैसे कर सकता है और बच्चों की सुरक्षा के लिए तुरंत कदम क्यों नहीं उठाए गए।
जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
फिलहाल, पूरा मामला अब लैब रिपोर्ट पर टिका हुआ है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि सैंपल जांच के लिए भेज दिए गए हैं और रिपोर्ट आने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। लेकिन तब तक सवाल यह बना हुआ है कि अगर रिपोर्ट में सिरप को जिम्मेदार पाया गया, तो सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर और भी गंभीर आरोप लगेंगे।


