मनीषा शर्मा। राजस्थान विधानसभा का पाँचवाँ सत्र 28 जनवरी से शुरू होने जा रहा है। इस संबंध में राज्यपाल की ओर से आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी हो चुका है। सत्र से पहले नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली द्वारा उठाए गए एक महत्वपूर्ण मुद्दे ने कमेटियों की कार्यप्रणाली को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
कमेटी के फैसले सीधे सार्वजनिक नहीं किए जा सकते
टीकाराम जूली ने कहा कि विधानसभा के अंदर गठित किसी भी कमेटी के निर्णयों को सीधे सार्वजनिक करना नियमों के खिलाफ है। उनके अनुसार, कमेटियों का उद्देश्य अध्ययन, समीक्षा और सुझाव तैयार करना होता है, जिन्हें पहले विधानसभा के पटल पर रखा जाना चाहिए।
विधानसभा अध्यक्ष ने दिए सख्त निर्देश
जूली के इस आधिकारिक पत्र पर विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने तुरंत संज्ञान लिया। उन्होंने सभी कमेटी चेयरमैन को निर्देश जारी किए कि कोई भी निर्णय पहले सदन में प्रस्तुत किया जाए और उसके बाद ही उसे मीडिया या जनता तक पहुंचाया जाए।
पत्र में क्यों ज़ोर दिया गया नियमों पर
जूली ने पत्र में स्पष्ट किया कि यदि कमेटियों के फैसले सीधे सार्वजनिक होने लगें, तो समीक्षा और बहस की लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इससे न केवल नियमों का उल्लंघन होता है, बल्कि कई बार अधूरी जानकारी भी बाहर चली जाती है, जो भ्रम पैदा कर सकती है।
पारदर्शिता और अनुशासन को मिलेगा बल
इस निर्देश के बाद अब कमेटियों के सभी निर्णय सदन के रिकॉर्ड का हिस्सा बनेंगे और फिर सार्वजनिक होंगे। विधायकों का मानना है कि इससे जवाबदेही बढ़ेगी और कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी होगी। साथ ही विधानसभा की गरिमा और अनुशासन भी मजबूत होगा।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मजबूत होगी
विशेषज्ञों का मानना है कि सत्र शुरू होने से पहले लिया गया यह निर्णय प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने की दिशा में बड़ा कदम है। कमेटियों की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा, क्योंकि हर फैसला औपचारिक चर्चा और निगरानी के बाद ही सार्वजनिक होगा।
अब क्या बदलेगा
अब से विधानसभा की किसी भी कमेटी का निर्णय तभी सार्वजनिक माना जाएगा, जब वह पहले सदन के पटल पर रखा जा चुका होगा। इससे निर्णय-प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित, जवाबदेह और नियमबद्ध बनेगी, साथ ही परंपराओं और मर्यादा की भी रक्षा होगी।


