मनीषा शर्मा। राजस्थान के कोटा जिले में सर्दी का मौसम आते ही एक अनोखा लेकिन खतरनाक दृश्य आम हो गया है। यहां चंद्रलोई नदी और इसके सहायक नालों के आसपास बसे गांवों में खेतों की मुंडेर पर 12 से 15 फीट तक लंबे मगरमच्छ खुलेआम धूप सेकते हुए दिखाई देते हैं। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक यह मगरमच्छ खेतों के किनारों पर लेटे रहते हैं, मानो किसान के खेत उनकी आरामगाह हों। इस वजह से कोटा के कई किसान लगातार खतरे के साये में खेती करने को मजबूर हैं।
कोटा के ग्रामीण इलाकों में स्थित घड़ियाल सेंचुरी के पास बहने वाली चंद्रलोई नदी और उसके सहायक रायपुरा नाले में भारी संख्या में मगरमच्छ मौजूद हैं। जैसे ही दिसंबर में ठंड बढ़ती है और दिन में तेज धूप निकलती है, ये मगरमच्छ पानी छोड़कर खेतों की तरफ रुख कर लेते हैं। यही वजह है कि कई गांव—जैसे रायपुरा, देवली अरब, हनुवंतखेड़ा, हाथीखेड़ा, मडनिया, खेड़ा रसूलपुर, चडिंदा, दसलाना, बोरखंडी, जगन्नाथपुरा, अर्जुनपुरा, चंद्रेसल, रामखेडली और मानसगांव—इन दिनों सबसे ज्यादा खतरे की जद में हैं।
खेतों में खुलेआम लेटे रहते हैं मगरमच्छ
ग्रामीण बताते हैं कि सुबह जैसे ही धूप निकलती है, मगरमच्छ जमीन की गर्माहट लेने के लिए खेतों में पहुंच जाते हैं। जो किसान नदी या नाले के बिलकुल पास जमीन रखते हैं, उनके लिए स्थिति ज्यादा जोखिम भरी है। खेती करते समय अचानक पास की मुंडेर पर पड़े मगरमच्छों को देखकर लोगों में दहशत फैल जाती है।
मवेशियों पर इनका खतरा कई बार देखने को मिला है। कई घटनाओं में मगरमच्छ खेतों के पास चर रहे पशुओं को पानी में खींचकर शिकार बना चुके हैं। इंसानों पर भी हमला करने की घटनाएं सामने आई हैं, हालांकि अधिकांश किसान इस खतरे को अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानकर खेती करना जारी रखते हैं।
कुछ किसानों के लिए ‘दोस्त’ बने मगरमच्छ
दिलचस्प बात यह है कि इलाके के कुछ किसान इन मगरमच्छों को अपना ‘दोस्त’ बताते हैं। उनका कहना है कि अक्सर वे इनके पास पहुंचते हैं, लेकिन मगरमच्छ हमला करने के बजाय धीरे से नदी की ओर लौट जाते हैं। कई ग्रामीणों का मानना है कि अगर उन्हें परेशान न किया जाए तो मगरमच्छ भी नुकसान नहीं पहुंचाते। बावजूद इसके, खेतों के आसपास इनका इस तरह खुले में रहना किसी भी समय गंभीर हादसे का कारण बन सकता है।
विशेषज्ञों की राय: ठंड में शरीर गर्म रखने के लिए धूप में आते हैं मगरमच्छ
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार मगरमच्छ रेप्टाइल श्रेणी का जीव है, जिसका खून ठंडा होता है। ठंड के दिनों में उनका शरीर सुस्त पड़ जाता है, इसलिए वे पानी की तुलना में जमीन पर आकर धूप में ज्यादा समय बिताते हैं। इससे उनका शरीर गर्म होता है, पाचन क्रिया सुचारू रहती है और वे सक्रिय बने रहते हैं। यही कारण है कि सर्दियों में मगरमच्छ खेतों, नालों और तालाबों की मुंडेर पर सामूहिक रूप से लेटे दिखाई देते हैं।
कोटा के इन ग्रामीण क्षेत्रों में मगरमच्छों की बढ़ती संख्या और उनका खेतों तक पहुंचना ग्रामीणों के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। हालांकि स्थानीय लोग इनके साथ तालमेल बनाकर जीने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वन विभाग के लिए यह एक गंभीर चुनौती है कि इंसानों और मगरमच्छों के बीच बढ़ती नजदीकी से किसी तरह के बड़े हादसे न हों।


