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एलिवेटेड रोड विवाद: गलत शपथ पत्र पर अफसरों को न्यायालय का नोटिस

एलिवेटेड रोड विवाद: गलत शपथ पत्र पर अफसरों को न्यायालय का नोटिस

मनीषा शर्मा, अजमेर । राजस्थान के अजमेर शहर में बहुचर्चित रामसेतु एलिवेटेड रोड परियोजना को लेकर एक बार फिर कानूनी विवाद गहराता जा रहा है। इस बार मुद्दा बना है आरएसआरडीसी (राजस्थान स्टेट रोड डेवलपमेंट एंड कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन) की महिला परियोजना अधिकारी द्वारा कोर्ट में पेश किया गया कथित गलत शपथ पत्र, जिसमें एलिवेटेड रोड को सुरक्षित बताया गया था। इसी को लेकर पूर्व विधायक राजकुमार जयपाल ने अदालत में अवमानना याचिका दायर की है, जिस पर शुक्रवार को सुनवाई हुई।

इस याचिका में दावा किया गया है कि संबंधित अधिकारियों ने कोर्ट को गुमराह करते हुए सत्य से विपरीत जानकारी दी है, जिससे न सिर्फ परियोजना पर सवाल खड़े होते हैं बल्कि आमजन की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। इस मामले में कोर्ट ने स्मार्ट सिटी सीओ, अजमेर जिला कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त और RSRDC की परियोजना अधिकारी चारु मित्तल को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

 याचिका की पृष्ठभूमि

इस पूरे मामले की जड़ में है अजमेर एलिवेटेड रोड की महावीर सर्किल से सोनी जी की नसिया भुजा, जिसे अब तक आम जनता के लिए चालू नहीं किया गया है। अधिवक्ता विवेक पाराशर ने कोर्ट को बताया कि इस भुजा को चालू करने से पहले MNIT (मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) की रिपोर्ट मांगी गई थी, लेकिन वह रिपोर्ट अब तक न्यायालय के समक्ष नहीं रखी गई है। इसके बावजूद परियोजना अधिकारी चारु मित्तल की ओर से अदालत में यह शपथ पत्र दिया गया कि एलिवेटेड रोड पूरी तरह सुरक्षित है, जिसके बाद परियोजना की अन्य भुजाओं को जनता के लिए खोल दिया गया। लेकिन महावीर सर्किल की यह भुजा अभी भी बंद है और उससे जुड़ी सुरक्षा स्थिति स्पष्ट नहीं है।

 हेल्पलाइन नंबर भी नहीं लगाए गए

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के बावजूद एलिवेटेड रोड पर किसी भी स्थान पर हेल्पलाइन नंबर प्रदर्शित नहीं किए गए, जिससे आपात स्थिति में यात्रियों को मदद नहीं मिल सकती। यह सीधे तौर पर आम जनता की सुरक्षा के साथ समझौता है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यदि किसी प्रकार की दुर्घटना या तकनीकी गड़बड़ी होती है, तो जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं होगा

न्यायालय की तीखी टिप्पणी

कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि यदि किसी भी अधिकारी ने अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया है, तो उसे कड़ी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। कोर्ट ने इस आधार पर चार अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है कि शपथ पत्र में गलत जानकारी क्यों दी गई और हेल्पलाइन नंबर क्यों नहीं लगाए गए।

 प्रशासनिक चुप्पी और राजनीतिक सवाल

इस प्रकरण से एक बार फिर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और उससे जुड़ी पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। पूर्व विधायक राजकुमार जयपाल ने कहा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां आमजन के जीवन से खिलवाड़ कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने जल्दबाज़ी में कोर्ट को गुमराह करने के लिए अधूरी जांच रिपोर्ट के बिना ही शपथ पत्र दाखिल कर दिया, जो न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है।

अगली सुनवाई 4 अगस्त को

कोर्ट ने अब मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त 2025 को तय की है। तब तक सभी चारों अधिकारियों से यह उम्मीद की जा रही है कि वे अदालत को स्पष्ट रूप से यह बताएंगे कि किस आधार पर शपथ पत्र दिया गया और अब तक हेल्पलाइन नंबर क्यों नहीं लगाए गए। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी मांग की गई है कि जब तक MNIT की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती, तब तक संबंधित भुजा को खोलने की अनुमति न दी जाए। साथ ही, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही भी की जाए।

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