राजस्थान के सीकर स्थितपंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी यूनिवर्सिटी में अघोरी बाबा शैलेंद्र नाथ को मानद उपाधि देने के फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन के इस निर्णय के खिलाफ छात्र संगठन Students Federation of India ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों ने नारेबाजी की और मुख्य गेट पर कुलपति का पुतला जलाकर अपना आक्रोश जताया। यह विरोध दीक्षांत समारोह से ठीक पहले सामने आया है, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।
अघोरी बाबा को सम्मान देने के फैसले पर सवाल
जानकारी के अनुसार, मुकुंदगढ़ के अघोरी बाबा शैलेंद्र नाथ को दीक्षांत समारोह में मानद उपाधि देने का प्रस्ताव रखा गया था। इसी निर्णय के विरोध में एसएफआई के कार्यकर्ता विश्वविद्यालय पहुंचे और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की।
छात्र नेताओं का कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति को सम्मानित करने का मामला नहीं है, बल्कि यह विश्वविद्यालय की शैक्षणिक दिशा और मूल्यों से जुड़ा सवाल है। उनका आरोप है कि इस फैसले से अंधविश्वास और नशे की संस्कृति को बढ़ावा मिल सकता है।
“ज्ञान बनाम अंधविश्वास” की बहस
प्रदर्शन के दौरान छात्र नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि विश्वविद्यालयों का उद्देश्य ज्ञान, तर्क और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना होना चाहिए। ऐसे में किसी अघोरी साधु को मानद उपाधि देना शिक्षा व्यवस्था की मूल भावना के खिलाफ है।
एसएफआई के नेता महिपाल गुर्जर ने कहा कि एक ओर सरकार “नशा मुक्त भारत” की बात करती है, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करने जा रहा है, जिसे छात्र आदर्श के रूप में देख सकते हैं। उन्होंने इसे दोहरे मानदंड का उदाहरण बताया।
दीक्षांत समारोह में उग्र विरोध की चेतावनी
छात्र संगठन ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन अपना फैसला वापस नहीं लेता है, तो दीक्षांत समारोह के दौरान विरोध और तेज किया जाएगा। एसएफआई कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे कुलाधिपति राज्यपाल के विश्वविद्यालय आगमन का स्वागत करते हैं, लेकिन विवादित निर्णय को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनका कहना है कि यह मुद्दा छात्रों की भावनाओं और शिक्षा के मूल्यों से जुड़ा हुआ है, इसलिए वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी
इस पूरे विवाद के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासन की चुप्पी ने छात्रों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में पारदर्शिता और संवाद बेहद जरूरी होता है, ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी या विवाद को समय रहते सुलझाया जा सके।
शिक्षा संस्थानों की भूमिका पर उठे सवाल
इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों की भूमिका क्या होनी चाहिए। क्या विश्वविद्यालयों को केवल अकादमिक उपलब्धियों के आधार पर ही सम्मान देना चाहिए या समाज के अन्य क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तित्वों को भी मान्यता दी जानी चाहिए। हालांकि, इस मामले में विरोध करने वाले छात्र संगठनों का कहना है कि सम्मान देने के लिए व्यक्ति की सामाजिक छवि और उसके संदेश का भी ध्यान रखना जरूरी है।


