राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव को लेकर विवाद एक बार फिर न्यायालय की दहलीज तक पहुंच गया है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग राजस्थान के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार और चुनाव आयोग जानबूझकर चुनाव प्रक्रिया को टाल रहे हैं, जो न्यायालय के आदेश की अवहेलना है। इस याचिका के बाद राज्य में चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। मामला अब इस बात पर केंद्रित हो गया है कि क्या चुनाव निर्धारित समयसीमा में कराए जाएंगे या फिर इसमें और देरी होगी।
अवमानना याचिका में क्या कहा गया
याचिकाकर्ता संयम लोढ़ा ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्य चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम से यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव समय पर कराना संभव नहीं है। आयोग ने चरणबद्ध तरीके से 22 अप्रैल तक अंतिम मतदाता सूची जारी करने का कार्यक्रम तय किया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब अंतिम मतदाता सूची ही 22 अप्रैल को जारी होगी, तो 15 अप्रैल तक चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं। याचिका में इसे कोर्ट के आदेश की सीधी अवमानना बताया गया है।
पहले भेजा गया था लीगल नोटिस
अवमानना याचिका दायर करने से पहले संयम लोढ़ा ने सरकार और राज्य चुनाव आयोग को अधिवक्ता पुनीत सिंघवी के माध्यम से लीगल नोटिस भेजा था। इस नोटिस में आयोग से अपील की गई थी कि वह मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम को संशोधित करे और इसे 15 अप्रैल की समयसीमा के अनुरूप पुनः जारी करे। साथ ही यह भी चेतावनी दी गई थी कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो अवमानना याचिका दायर की जाएगी। हालांकि नोटिस के बावजूद पुनरीक्षण कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिसके बाद यह मामला हाईकोर्ट में पहुंच गया।
हाईकोर्ट का पूर्व आदेश
इस पूरे विवाद की जड़ में हाईकोर्ट का वह आदेश है, जो 14 नवंबर 2025 को सुनाया गया था। राजस्थान हाईकोर्ट ने 439 याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव 15 अप्रैल 2026 तक कराए जाएं। इसके साथ ही अदालत ने सरकार को 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने का भी निर्देश दिया था। यह आदेश राज्य में लंबे समय से लंबित चुनावों को लेकर दिया गया था, ताकि स्थानीय निकायों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हो सके।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठा मामला
हाईकोर्ट के इस आदेश को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान भी अदालत ने राज्य में 15 अप्रैल तक चुनाव कराने की आवश्यकता पर जोर दिया था। इससे यह स्पष्ट हो गया था कि न्यायपालिका इस मामले में समयसीमा को लेकर गंभीर है और चुनावों में अनावश्यक देरी स्वीकार्य नहीं होगी।
चुनाव प्रक्रिया पर बढ़ता संशय
अब राज्य चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम ने पूरे चुनाव कार्यक्रम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि 22 अप्रैल तक अंतिम मतदाता सूची जारी होती है, तो चुनाव प्रक्रिया को समय पर पूरा करना लगभग असंभव हो जाएगा। इस स्थिति में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और चुनाव आयोग अदालत में क्या जवाब देते हैं और क्या वे समयसीमा में बदलाव के लिए कोई ठोस कारण प्रस्तुत कर पाते हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव
इस मामले के राजनीतिक मायने भी काफी महत्वपूर्ण हैं। पंचायत और निकाय चुनाव स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने का अहम माध्यम होते हैं। ऐसे में चुनावों में देरी से प्रशासनिक कार्यप्रणाली भी प्रभावित होती है। यदि अदालत इस मामले में सख्त रुख अपनाती है, तो सरकार और चुनाव आयोग को तत्काल कदम उठाने पड़ सकते हैं। वहीं यदि समयसीमा में ढील दी जाती है, तो इससे भविष्य में चुनावी प्रक्रिया पर भी असर पड़ सकता है।
आगे क्या
अब यह मामला पूरी तरह अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा। हाईकोर्ट सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांग चुका है और आने वाली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या वास्तव में आदेश की अवमानना हुई है या फिर परिस्थितियों के चलते देरी हुई है।


