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बाड़मेर- बालोतरा सीमा विवाद: जिलों के फेरबदल पर कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने

बाड़मेर- बालोतरा सीमा विवाद: जिलों के फेरबदल पर कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने

पश्चिमी राजस्थान में जिलों की सीमाओं में किए गए ताजा फेरबदल ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। बाड़मेर और बालोतरा जिलों की सीमाओं में बदलाव के बाद कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गई हैं। कांग्रेस इस फैसले को राजनीतिक तोड़फोड़ और जनविरोधी कदम बता रही है, जबकि भाजपा इसे प्रशासनिक संतुलन और क्षेत्रीय समानता की दिशा में जरूरी सुधार करार दे रही है। इस विवाद ने न केवल राजनीतिक गलियारों में, बल्कि आम जनता के बीच भी तीखी बहस को जन्म दे दिया है।

भजनलाल शर्मा सरकार ने 31 दिसंबर 2025 को एक आदेश जारी करते हुए गुड़ामालानी और धोरीमना तहसीलों को बाड़मेर जिले से हटाकर बालोतरा जिले में शामिल करने का फैसला किया। वहीं, बायतु तहसील को बालोतरा से निकालकर पुनः बाड़मेर जिले में जोड़ दिया गया। सरकार के इस निर्णय के बाद क्षेत्रीय समीकरण अचानक बदल गए और विरोध के स्वर तेज हो गए।

क्या भाजपा ने कांग्रेस सरकार का फैसला पलट दिया?

इस फैसले को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के निर्णय को आंशिक रूप से पलटने के रूप में देखा जा रहा है। वर्ष 2023 में कांग्रेस शासन के दौरान बालोतरा को नया जिला घोषित किया गया था। उस समय बायतु तहसील को बालोतरा जिले में शामिल किया गया था, जबकि गुड़ामालानी और धोरीमना को बाड़मेर में ही रखा गया था। अब नए परिसीमन से न केवल जिलों की भौगोलिक सीमाएं बदली हैं, बल्कि राजनीतिक संतुलन पर भी इसका असर पड़ता दिख रहा है।

कांग्रेस ने इस बदलाव को लेकर आक्रामक रुख अपनाया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी ने धोरीमना उपखंड मुख्यालय पर धरना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि यह निर्णय स्थानीय जनता की भावनाओं, सुविधाओं और प्रशासनिक जरूरतों की अनदेखी करके लिया गया है।

कांग्रेस का आरोप: राजनीतिक लाभ के लिए बदलाव

कांग्रेस के मध्य प्रदेश प्रभारी और बायतु विधायक हरीश चौधरी, सांसद उम्मीद राम बेनीवाल सहित कई नेता इस मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहे हैं। कांग्रेस का तर्क है कि गुड़ामालानी और धोरीमना को बालोतरा जिले में शामिल करने से लोगों को प्रशासनिक कामों के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ेगी। इससे पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे रेगिस्तानी इलाकों में आमजन की समस्याएं और बढ़ेंगी।

हरीश चौधरी ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया, तो यह निर्णय पूरी तरह जनविरोधी साबित होगा। कांग्रेस का सीधा आरोप है कि यह पूरा फेरबदल राजनीतिक लाभ और चुनावी गणित को ध्यान में रखकर किया गया है।

भाजपा का जवाब: संतुलन और समान भागीदारी का दावा

भाजपा ने कांग्रेस के सभी आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। भाजपा उपाध्यक्ष रमेश सिंह इंदा ने कहा कि यह परिसीमन आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए सभी क्षेत्रों और वर्गों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। उनका कहना है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक विफलताओं से बौखलाई हुई है और अब केवल विरोध की राजनीति कर रही है।

भाजपा नेताओं का दावा है कि आम जनता इस फैसले से संतुष्ट है और कांग्रेस के अलावा किसी बड़े जनआंदोलन के संकेत नहीं मिल रहे हैं।

प्रशासनिक फैसला या सियासी रणनीति?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिलों की सीमाओं में बदलाव केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे जातीय, सामाजिक और राजनीतिक समीकरण भी जुड़े होते हैं। बाड़मेर और बालोतरा जैसे क्षेत्रों में पहले से ही पानी, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं चुनौती बनी हुई हैं। ऐसे में जिला मुख्यालयों की दूरी बदलना आम लोगों के लिए नई प्रशासनिक मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

कई जानकार इसे 2028 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं, जबकि कांग्रेस इसे अपनी सियासी एकजुटता और जनभावनाओं को भुनाने का अवसर देख रही है। फिलहाल धरना और विरोध जारी हैं और अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार करती है या पश्चिमी राजस्थान में यह सियासी जंग और तेज होती है।

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