मनीषा शर्मा। राजस्थान की राजनीति में इन दिनों निकाय चुनावों को लेकर गर्माहट बढ़ गई है। राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के बीच निकाय चुनाव की तारीख और प्रक्रिया को लेकर गंभीर मतभेद सामने आ गए हैं। एक ओर जहां राज्य निर्वाचन आयुक्त मधुकर गुप्ता ने हाईकोर्ट के आदेशों के अनुसार दो महीने के भीतर चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी, वहीं दूसरी ओर यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा का कहना है कि दिसंबर 2025 में सभी 309 शहरी निकायों के एक साथ चुनाव करवाए जाएंगे। यह विवाद अब सीधा सरकार बनाम आयोग की स्थिति में तब्दील हो गया है।
निर्वाचन आयुक्त की घोषणा और सरकार की आपत्ति
राज्य निर्वाचन आयुक्त मधुकर गुप्ता ने साफ कहा था कि जिन निकायों और पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पूरा हो चुका है या जो दो महीने में पूरा हो जाएगा, वहां चुनाव करवाना उनकी जिम्मेदारी है। गुप्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि “वन स्टेट, वन इलेक्शन” व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, इसलिए समय पर चुनाव कराना ही सर्वोच्च प्राथमिकता है।
इसके विपरीत, झाबर सिंह खर्रा का बयान बिल्कुल अलग दिशा में जाता है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के आदेशों के हिसाब से फरवरी 2026 तक का समय है, लेकिन सरकार दिसंबर 2025 में ही सभी निकायों के एक साथ चुनाव कराएगी। खर्रा ने यहां तक कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग चाहे कार्यक्रम जारी कर दे, लेकिन सरकार अपने हिसाब से आगे की रणनीति बनाएगी।
सरकार की रणनीति: दिसंबर में ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’
यूडीएच मंत्री खर्रा ने मीडिया से बातचीत में यह भी साफ कर दिया कि दिसंबर 2025 में ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ के तहत चुनाव कराने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। परिसीमन की प्रक्रिया भी लगभग पूरी हो चुकी है और अधिसूचना सप्ताह भर में जारी कर दी जाएगी। उनका मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से प्रशासनिक और वित्तीय बोझ कम होगा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी तरीके से संपन्न हो सकेगी।
पंचायत चुनावों पर दुविधा
जहां सरकार निकाय चुनाव एक साथ कराने पर अड़ी हुई है, वहीं पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव को लेकर स्थिति उलझी हुई है। झाबर सिंह खर्रा ने माना कि पंचायतीराज संस्थाओं का कार्यकाल अलग-अलग वर्षों में खत्म हो रहा है, कुछ का 2026 में और कुछ का 2027 में। ऐसे में सभी पंचायत चुनाव एक साथ कराना कठिन चुनौती है। हालांकि, सरकार इस दिशा में भी प्रयासरत है कि “वन स्टेट, वन इलेक्शन” की अवधारणा को पंचायत चुनावों तक भी लागू किया जा सके।
विपक्ष और मंत्री सुमित गोदारा के बयान
इस बीच, खाद्य मंत्री सुमित गोदारा ने पूर्व गहलोत सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अशोक गहलोत सरकार ने पंचायत राज व्यवस्था को पूरी तरह बिगाड़ दिया था। गोदारा ने दावा किया कि वर्तमान सरकार की प्राथमिकता पंचायत और निकाय चुनाव समय पर कराना है और सब-कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है। गोदारा ने यह भी जोर देकर कहा कि “वन स्टेट, वन इलेक्शन” अब प्रदेश की आवश्यकता है, जिससे चुनाव प्रक्रिया सरल और सुगम बन सके।
अफसरशाही और राजनीति का टकराव
यह टकराव सिर्फ चुनाव की तारीखों को लेकर नहीं है, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाम संवैधानिक दायित्व का भी प्रतीक बन गया है। निर्वाचन आयोग का दायित्व है कि वह समय पर चुनाव कराए और लोकतंत्र की प्रक्रिया को बाधित न होने दे। दूसरी ओर, सरकार अपने राजनीतिक और प्रशासनिक हितों को ध्यान में रखते हुए चुनावों की टाइमलाइन तय करना चाहती है।
हाईकोर्ट की भूमिका
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया था कि छह महीने के भीतर चुनाव संपन्न होने चाहिए। इस आदेश की व्याख्या सरकार अपने तरीके से कर रही है और कह रही है कि फरवरी 2026 तक समय है, जबकि आयोग का मानना है कि आदेश का अर्थ है कि जितनी जल्दी हो सके चुनाव कराए जाएं। यही वजह है कि आयोग ने दो महीने में चुनाव कराने की बात कही थी।
जनता और लोकतंत्र पर असर
राजस्थान के निकाय और पंचायत चुनाव सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि इनका सीधा संबंध जनता की भागीदारी और लोकतांत्रिक ढांचे से है। अगर चुनावों में देरी होती है या राजनीतिक लाभ-हानि को ध्यान में रखकर तारीखें तय की जाती हैं, तो इससे जनता का भरोसा प्रभावित होता है। यही कारण है कि इस टकराव को लेकर आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा तेज हो गई है।


