बाड़मेर की सोहनी कुमारी का साहसिक कदम “आख़िर पलायन कब तक”

“हमारे देश को आज़ाद हुए पचहत्तर से अधिक वर्ष गुजर चुके हैं लेकिन अभी भी देश के संविधान में कुछ ऐसे क़ानून है जिनका ग़लत इश्तेमाल कर कुछ लोग धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा ही एक क़ानून है वक़्फ़ एक्ट दरअसल 1954 में वक्फ की संपत्ति और उसके रखरखाव के लिए वक्फ एक्ट-1954 बनाया गया था। कोई भी ऐसी चल या अचल संपत्ति वक्फ की हो सकती है, जिसे इस्लाम को मानने वाला कोई भी व्यक्ति धार्मिक कार्यों के लिए दान कर दे। 1995 में वक्फ कानून में संशोधन करते हुए वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियां दे दी गईं। कानून कहता है कि यदि वक्फ बोर्ड किसी संपत्ति पर अपना दावा कर दे, तो उसे उसकी संपत्ति माना जाएगा। यदि दावा गलत है तो संपत्ति के मालिक को इसे सिद्ध करना होगा। 2013 में फिर इसमें संशोधन किए गए।” लेकिन देश के कुछ हिस्सों में लोग इस क़ानून का उल्लंघन कर एक धर्म विशेष के लोगों की ज़मीन व संपत्ति हड़पने का काम कर रहे हैं, ऐसे ही कुछ पीड़ित परिवारों की कहानी है यह फ़िल्म। हमारी फ़िल्म किसी धर्म के ख़िलाफ़ या पक्ष में नहीं है बल्कि इसमें पीड़ित मानवता की आवाज़ उठाई गई है।

यह कहना है “आख़िर पलायन कब तक” फ़िल्म की मुख्य अभिनेत्री व फ़िल्म की निर्माता सोहनी कुमारी का जो आज जयपुर में फ़िल्म के प्रीमियर पर मीडिया से बात कर रही थी। सोहनी कुमारी का कहना है कि यह एक ऐसा क़ानून है जिसमें वक़्फ़ को असीमित शक्तियाँ दे दी गई है जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय तक में चुनौती नहीं दी जा सकती सिर्फ़ वक़्फ़ न्यायालय ही इनकी सुनवाई कर सकता है। वो कहती हैं , हमारी फ़िल्म किसी समुदाय विशेष की नहीं बल्कि लोगों की आवाज़ उठाती है ।हम सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने में यक़ीन रखते हैं। यह फ़िल्म बनाना आज की तारीख़ में बहुत ज़रूरी हो गया था इसीलिए हमने यह निर्णय लिया।

बतौर निर्माता अपनी पहली ही फ़िल्म एक बोल्ड विषय पर वो भी जोखिमपूर्ण पर बनाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि “मैं सामाजिक मुद्दों पर एक बेहतरीन फ़िल्म बनाना चाहती थी क्योंकि मैं अपने देश व समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहती हूँ। मैं ज़मीन से जुड़ी हुई हूँ और राजस्थान के बॉर्डर इलाक़े बाड़मेर के एक छोटे से गाँव से आती हूँ। मैंने गाँव से निकलकर मुंबई पहुँचने तक के सफ़र में बहुत कुछ देखा समझा है। मैं राजनीति हो या समाज हर चीज से ख़ुद को कनेक्ट करती हूँ। मैं तो देश के हर युवा से कहना चाहूँगी कि उन्हें पता होना चाहिए कि देश में क्या हो रहा है। आज से बीस साल पहले क्या हुआ था और क्यों हुआ था , साथ ही दस साल बाद क्या होने की आशंका है। यह सब जानने में मेरी रुचि रहती है। जब मैं पढ़ रही थी तो मैंने देखा कि हमारे यहाँ सिनेमा में कुछ अच्छा भी हो रहा है। कई ज़रूरी विषयों पर फ़िल्में बन रही है लेकिन साथ ही कुछ विषय आज भी अछूते बने हुए हैं ख़ासकर वास्तविक घटनाओं पर फ़िल्म बनाने से लोग कतराते हैं।

आज भी देश में कई ऐसे क़ानून है जिनका मानवता के विरुद्ध दुरुपयोग किया जा रहा है। इनकी जानकारी हर नागरिक को होनी चाहिए । आज ऐसे विषयों पर फ़िल्म बनाना पहले की अपेक्षा कुछ आसान हुआ है हाँलाकि अभी भी पूरी आज़ादी नहीं है। लोग धमकियाँ देते हैं, गालियाँ देते है लेकिन हम निडरता से अपना काम कर रहे हैं और यदि इस काम के लिए जान भी चली जाये तो कोई बुराई नहीं।

फिल्म डायरेक्टर मुकुल विक्रम बोले,”हम किसी पोलिटिकल एजेंडा या धर्म विशेष को टारगेट नहीं कर रहे है, यह बहुत से परिवारों की एक सच्ची कहानी हैं, जिसे लोगो तक पहुंचना बहुत जरूरी हैं, और वही हमने किया हैं”। आख़िर पलायन कब तक की कहानी निर्दोष लोगों की हत्याओं, नवनियुक्त एक पुलिस इंस्पेक्टर, एक लापता परिवार और उसके चार सदस्यों के साथ ही कई अन्य रोमांचक घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। फ़िल्म में मुस्लिमों द्वारा जानबूझकर हिंदुओं को निशाना बनाने की कहानी है। यह एक ज्वलनशील मुद्दा है कि कैसे एक मुस्लिम बोर्ड हिंदुओं की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके उन्हें निशान बनाता है। साथ ही असल में कहानी कश्मीरी पंडितों को मुस्लिम ‘मोहल्लों’ में रहने के घातक और भयानक अनुभवों को उजागर करती हैं, कि कैसे अल्पसंख्य और बहुसंख्यक समुदाय एक दूसरे के प्रति नफरत और द्वेष रखते हैं, और एक दूसरे को दबाने, डराने और बेइज्जत करने के लिए कैसे कैसे हथकंडे इस्तेमाल करते हैं।

आख़िर पलायन कब तक दर्शकों को पसंद आएगी, क्योंकि इस फिल्म में ऐसा कुछ हैं जो हम सबकी कहानी हैं, एक बुरे सामजिक सच की कहानी, जिसे देखा और महसूस सभी ने किया हैं, लेकिन उसके खिलाफ आवाज कभी नहीं उठाई। फिल्म में राजेश शर्मा, भूषण पटियाल, गौरव शर्मा, चितरंजन गिरी, धीरेंद्र द्विवेदी और सोहनी कुमारी हैं। आख़िर पलायन कब तक’ उन सभी सिनेमा प्रेमियों और फिल्म प्रेमियों के लिए ट्रीट होगी, जो यथार्थवादी सिनेमा देखना पसंद करते हैं। यह फिल्म जीवन और समाज की वास्तविक घटनाओं से हमें रूबरू कराती है।

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