मनीषा शर्मा। राजस्थान में बढ़ते साइबर फ्रॉड और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी नई प्रकार की ऑनलाइन ठगी को गंभीर खतरा मानते हुए जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने जोधपुर के 84 वर्षीय बुजुर्ग दंपती से 2 करोड़ 2 लाख रुपए की बड़ी धोखाधड़ी से जुड़े केस में दो आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए एक विस्तृत और रिपोर्टेबल जजमेंट जारी किया है। यह फैसला आगामी वर्षों में राजस्थान की साइबर सुरक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की दिशा तय कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि तकनीक के तेजी से प्रसार के साथ-साथ साइबर अपराध अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं और पुलिस-प्रशासन पारंपरिक तौर-तरीकों के कारण इस नए तरह के अपराध से लड़ने में काफी पीछे हैं। इसलिए राज्य को साइबर जांच, रोकथाम और समन्वय के लिए मजबूत ढांचा खड़ा करना होगा।
I4C की तर्ज पर R4C सेंटर बनाने का आदेश
कोर्ट ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को आदेश दिया कि वे केंद्र सरकार के भारतीय साइबर क्राइम को-ऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) की तरह राजस्थान में R4C – Rajasthan Cyber Crime Control Center की स्थापना के लिए अधिसूचना जारी करें। यह केंद्र राज्य में साइबर अपराधों की रोकथाम, जांच और इंटर-एजेंसी तालमेल के लिए नोडल संस्था के रूप में कार्य करेगा। साथ ही I4C के साथ लगातार डेटा और तकनीकी जानकारी साझा करेगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साइबर अपराधों में विशेषज्ञता की जरूरत है। इसलिए गृह विभाग और कार्मिक विभाग मिलकर DG साइबर के अधीन विशेष IT इंस्पेक्टर की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करें। ये अधिकारी केवल साइबर केस संभालेंगे और इन्हें अन्य विभागों में तैनात नहीं किया जाएगा।
सिम कार्ड पर नियंत्रण और बच्चों के लिए मोबाइल-इंटरनेट SOP
हाईकोर्ट ने डिजिटल उपकरणों और SIM कार्ड के नियंत्रण के लिए कड़े आदेश दिए हैं। निर्देशों में शामिल है कि—
किसी भी व्यक्ति के नाम पर 3 से अधिक SIM कार्ड जारी करने पर नियंत्रण के लिए विस्तृत SOP बनाई जाए।
राज्य में बिकने वाले सभी डिजिटल डिवाइसेज (नए या सेकेंड हैंड) की बिक्री और रजिस्ट्रेशन DG साइबर की निगरानी में ऑनलाइन सिस्टम के तहत हो।
16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए स्कूलों में मोबाइल फोन, ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने के लिए गृह विभाग, शिक्षा विभाग और अभिभावक संगठनों की संयुक्त पहल से SOP बनाई जाए। कोर्ट ने कहा कि बच्चों और किशोरों में डिजिटल लत, फर्जी गेम्स और सोशल मीडिया के दुरुपयोग को गंभीर खतरा माना जाना चाहिए।
बुजुर्ग दंपती से 2.02 करोड़ की ठगी: मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला एक ऐसे मामले के संदर्भ में दिया गया, जिसमें आरोपियों अदनान हैदर और राहुल जगदीश जाधव ने खुद को मुंबई साइबर पुलिस, ED और CBI अधिकारी बताकर बुजुर्ग दंपती को 10 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी मानसिक स्थिति में रखा। 29 अप्रैल से 8 मई 2025 के बीच उन्हें डराकर, भ्रमित करके और ऑनलाइन धमकी देकर 9 बैंक खातों में कुल 2 करोड़ 2 लाख रुपए ट्रांसफर करवाए। रिकॉर्ड के अनुसार 45 लाख रुपए सीधे इन दोनों आरोपियों के खातों में गए, जिसे उनके वकील भी नकार नहीं सके। वकीलों ने जमानत की दलील दी कि आरोप गलत हैं और अपराध का ट्रायल मजिस्ट्रेट स्तर पर है, परंतु सरकारी पक्ष ने इसका विरोध किया। कोर्ट ने माना कि आरोप बेहद गंभीर हैं और डिजिटल अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में जमानत नहीं दी जा सकती। अंततः दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
साइबर अपराध पर हाईकोर्ट की बड़ी चिंता
कोर्ट ने आदेश में कहा कि—
2019 से 2024 के बीच साइबर वित्तीय शिकायतों में कई गुना वृद्धि हुई है।
लेकिन FIR दर्ज होने और फ्रॉड की रकम फ्रीज होने का प्रतिशत बेहद कम है।
सामान्य पुलिस अधिकारी तकनीकी अभाव के कारण क्रिप्टो में बदली गई रकम या मल्टी-लेयर ट्रांजैक्शंस ट्रेस नहीं कर पाते। यह भी उल्लेख किया गया कि डिजिटल फ्रॉड में रकम कुछ ही मिनटों में कई खातों से होकर विदेश चली जाती है, जिससे नुकसान की भरपाई लगभग असंभव हो जाती है।
बैंकों और फिनटेक कंपनियों के लिए सख्त दिशानिर्देश
कोर्ट ने बैंकिंग सिस्टम को साइबर ठगी का सबसे कमजोर और सबसे शोषित बिंदु बताते हुए कड़े निर्देश दिए। आदेश के अनुसार—
सभी बैंक और फिनटेक कंपनियां RBI द्वारा विकसित ‘Mule Hunter’ जैसे AI टूल्स का अनिवार्य उपयोग करें।
संदिग्ध, निष्क्रिय या कम ट्रांजैक्शन वाले खातों की KYC दोबारा कराई जाए।
जिन खाताधारकों की सालाना लेनदेन 50 हजार रुपए से कम है या डिजिटल जानकारी कम है, उनके UPI और इंटरनेट बैंकिंग लिमिट्स पर नियंत्रण किया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अचानक बड़े लेनदेन होने पर— 48 घंटे के भीतर बैंक अधिकारी स्वयं ग्राहक के घर जाकर भौतिक सत्यापन करें, ताकि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों को रोका जा सके।
गिग वर्कर्स और डिजिटल डिवाइस नियंत्रण व्यवस्था
राज्य में ओला, उबर जैसे प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स की पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए—
अनिवार्य पुलिस वेरिफिकेशन,
QR कोड सहित ID कार्ड,
और दोहरी रजिस्ट्रेशन व्यवस्था लागू करने के आदेश दिए गए।
कॉल सेंटर और BPO को भी DG साइबर के साथ रजिस्ट्रेशन करने और आचार संहिता का पालन करने के निर्देश दिए गए।
डेटा प्रोटेक्शन, स्कूल, और जागरूकता कार्यक्रम
कोर्ट ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 को कड़ाई से लागू करने पर बल दिया। सभी सरकारी विभागों में डिजिटल ट्रांजैक्शन का मासिक ऑडिट अनिवार्य किया गया। साथ ही राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को ‘साइबर सिक्योरिटी अवेयरनेस सेल’ बनाने को कहा गया, ताकि जिले और तालुका स्तर पर विशेषज्ञों की मदद से लोगों में जागरूकता फैल सके।


