राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने वैवाहिक विवादों और मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े एक मामले में बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि जब पति और पत्नी दोनों ही आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं, तो अदालतों को तकनीकी आधार पर उनके रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए। इस फैसले को मुस्लिम कानून के तहत तलाक की प्रक्रिया, विशेष रूप से ‘मुबारत’ के संदर्भ में एक स्पष्ट मार्गदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।
क्या था पूरा मामला
मामला पाली जिले के निवासी आयशा चौहान और वसीम खान से जुड़ा है। दोनों का निकाह वर्ष 2022 में हुआ था, लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद उनके बीच गंभीर वैचारिक मतभेद उभर आए। हालात इस हद तक बिगड़ गए कि साथ रहना दोनों के लिए असंभव हो गया। काफी प्रयासों के बावजूद जब दांपत्य जीवन नहीं संभल सका, तो दोनों ने शरीयत के अनुसार अलग होने का निर्णय लिया।
मुस्लिम कानून के तहत तीन ‘तुहर’ की अवधि पूरी करने के बाद आयशा और वसीम ने 20 अगस्त 2024 को आपसी सहमति से ‘मुबारतनामा’ यानी तलाकनामा तैयार किया। इसके बाद उन्होंने अपनी वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से घोषित कराने के लिए मेड़ता स्थित फैमिली कोर्ट का रुख किया।
फैमिली कोर्ट ने क्यों खारिज की अर्जी
मेड़ता फैमिली कोर्ट ने इस मामले में दंपती की अर्जी को खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि इस तरह के मामलों में केवल आपसी सहमति के आधार पर तलाक की डिक्री देना उचित नहीं है और इसमें जनहित जैसे पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस फैसले से न केवल दंपती हैरान हुए, बल्कि यह मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया।
‘मियां-बीवी राजी, लेकिन काजी नहीं’—हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के आदेश पर कड़ी नाराजगी जताई। अपने रिपोर्टेबल जजमेंट की शुरुआत में ही हाईकोर्ट ने सदियों पुरानी कहावत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मामला बिल्कुल वैसा है, जहां “मियां-बीवी राजी, लेकिन काजी (अदालत) राजी नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि जब पति और पत्नी दोनों पूरी तरह से अलग होने का मन बना चुके हों, तो अदालत का काम उनके फैसले का सम्मान करना होना चाहिए, न कि उसमें अनावश्यक कानूनी अड़चनें खड़ी करना।
मुबारत तलाक पर हाईकोर्ट की स्पष्ट राय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा कि ‘मुबारत’ मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक का एक पूरी तरह से वैध और मान्य तरीका है। जस्टिस अरुण मोंगा ने टिप्पणी की कि फैमिली कोर्ट शायद इस गलतफहमी में थी कि जनहित, निजी सहमति से ऊपर है। जबकि सच्चाई यह है कि जब कोई वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुका हो, तो उसे जबरदस्ती जारी रखने से न तो समाज का और न ही किसी व्यक्ति का कोई भला होता है।
निजी सहमति बनाम जनहित का सवाल
हाईकोर्ट ने इस मामले में निजी सहमति और तथाकथित जनहित के बीच संतुलन को भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि जनहित का मतलब यह नहीं हो सकता कि दो वयस्क व्यक्तियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध एक असफल विवाह में बांधे रखा जाए। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और मानसिक शांति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
फैमिली कोर्ट के आदेश पर रोक, दंपती को राहत
राजस्थान हाईकोर्ट ने मेड़ता फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि वैवाहिक स्थिति को घोषित करना अदालत की जिम्मेदारी है, न कि उसमें अड़चन डालना। कोर्ट ने दंपती को कानूनी राहत देते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि जब कानून किसी प्रक्रिया को मान्यता देता है और दोनों पक्ष सहमत हों, तो निचली अदालतों को उसमें हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
मुस्लिम पर्सनल लॉ और न्यायिक दृष्टिकोण पर असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक की प्रक्रियाओं को लेकर फैली कई भ्रांतियों को दूर करेगा। साथ ही, यह निर्णय फैमिली कोर्ट्स के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्ध होगा कि वे वैवाहिक विवादों में संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएं।
क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण
यह फैसला सिर्फ एक दंपती तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां आपसी सहमति से तलाक के बावजूद अदालतों में अनावश्यक अड़चनें आती हैं। राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय यह संदेश देता है कि कानून का उद्देश्य रिश्तों को जबरन बनाए रखना नहीं, बल्कि न्याय, सहमति और मानवीय गरिमा की रक्षा करना है।


