प्रदेश में बजरी खनन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर हाई कोर्ट ने बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए 93 बजरी खनन पट्टों की लीज को समाप्त करते हुए उनकी ई-नीलामी के आदेश रद्द कर दिए हैं। यह फैसला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। यह निर्णय न केवल खनन नीति बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
जनहित याचिका पर आया फैसला
यह मामला डॉ. बृजमोहन सपूत कला संस्कृति सेवा संस्थान द्वारा दायर जनहित याचिका के माध्यम से अदालत के सामने आया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य सरकार ने नियमों की अनदेखी करते हुए उन क्षेत्रों में दोबारा बजरी खनन की अनुमति दे दी, जहां पहले ही खनन की अवधि पूरी हो चुकी थी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कमलाकर शर्मा और अधिवक्ता अलंकृता शर्मा ने अदालत को बताया कि सरकार ने खनन कानूनों के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट और केन्द्रीय एंपावरमेंट कमेटी (CEC) की सिफारिशों का भी उल्लंघन किया है।
क्या कहा हाई कोर्ट ने
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि नियमानुसार एक बार खनन की अवधि पूरी हो जाने के बाद उस क्षेत्र में अगले पांच साल तक खनन नहीं किया जा सकता। इसका उद्देश्य नदी और पर्यावरण को प्राकृतिक रूप से पुनर्भरण का समय देना है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने पुराने खनन क्षेत्रों को 12 से 100 हेक्टेयर तक के छोटे-छोटे ब्लॉकों में विभाजित कर दोबारा ई-नीलामी कर दी। अदालत ने इसे नियमों की खुली अवहेलना माना और सभी 93 बजरी खनन पट्टों की लीज को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट और CEC के निर्देशों की अनदेखी
अदालत के समक्ष यह भी रखा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2021 में CEC की रिपोर्ट को मंजूरी दी थी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि खनन अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित क्षेत्र में कम से कम पांच वर्षों तक किसी भी प्रकार का खनन कार्य नहीं होगा। इस अवधि में नदी में बजरी का प्राकृतिक पुनर्भरण होना आवश्यक है ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे। हाई कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार द्वारा जारी ई-नीलामी आदेश इन निर्देशों के खिलाफ हैं।
पर्यावरण और भूजल पर गंभीर असर
जनहित याचिका में बताया गया कि अनियंत्रित बजरी खनन से नदियों का तल लगातार गहरा होता जा रहा है। इसका सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ रहा है, जो तेजी से नीचे जा रहा है। इससे न केवल पीने के पानी की समस्या बढ़ रही है, बल्कि कृषि भूमि भी प्रभावित हो रही है। याचिका में यह भी कहा गया कि प्रदेश में सालभर बहने वाली नदियां बहुत कम हैं। अधिकांश नदियां मानसून पर निर्भर हैं और खनन के कारण उनका प्राकृतिक पुनर्भरण भी पूरा नहीं हो पाता। नतीजतन नदी किनारे की जमीन बंजर हो रही है और मछली पालन जैसे पारंपरिक रोजगार भी खत्म हो रहे हैं।
सरकार से मांगी गई पुनर्भरण रिपोर्ट
हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि जिन स्थानों से बजरी निकाली जाएगी, वहां उसका पुनर्भरण कैसे और किस प्रक्रिया से होगा। अदालत ने कहा कि यह रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश की जाए और आवश्यकता पड़ने पर इसे सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका के साथ भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
फैसले के व्यापक मायने
हाई कोर्ट का यह निर्णय आने वाले समय में राज्य की खनन नीति पर गहरा असर डाल सकता है। यह फैसला न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक मजबूत कदम है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से बजरी खनन को लेकर पारदर्शिता बढ़ेगी और नदी-पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता मिलेगी।


