राजस्थान की राजनीति में गुरुवार का दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा। राज्य की तीसरी प्रमुख राजनीतिक शक्ति मानी जाने वाली भारत आदिवासी पार्टी (BAP) को उस समय बड़ा झटका लगा, जब पार्टी के कई प्रमुख नेताओं ने सामूहिक रूप से पार्टी छोड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। यह घटना राजनीतिक रूप से इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि इसमें वे चेहरे भी शामिल हैं जो लंबे समय से आदिवासी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।
इस बड़े बदलाव के केंद्र में वह नाम रहा जिसने लंबे समय तक BAP को मजबूत आधार देने का प्रयास किया—प्रोफेसर मणिलाल गरासिया। आदिवासी राजनीति में प्रभावशाली पहचान रखने वाले प्रो. गरासिया का पार्टी से अलग होना न सिर्फ संगठन के लिए झटका है बल्कि क्षेत्रीय राजनीति की दिशा और समीकरणों को भी बदल सकता है।
BAP नेता प्रो. मणिलाल गरासिया का कांग्रेस में प्रवेश
प्रो. मणिलाल गरासिया, जो पहले भी पार्टी के संयोजक संरक्षक रह चुके हैं, ने गुरुवार को अपने कई सहयोगियों और जिला टीम के साथ मिलकर कांग्रेस की सदस्यता ली। प्रो. गरासिया राजस्थान के बांसवाड़ा क्षेत्र की राजनीति में विशेष पहचान रखते हैं और आदिवासी समाज के मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम करते रहे हैं। वे पूर्व में भी गढ़ी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं और इस समय शिक्षक कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष भी हैं। कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि वे लंबे समय से पार्टी के दिशा-विहीन नेतृत्व और जातिवादी, नफरत आधारित राजनीति से बेहद परेशान थे। उनका कहना था कि आदिवासी समाज के विकास के नाम पर बीएपी कुछ ही व्यक्तियों के स्वार्थ की राजनीति में बदल गई है, जिसका नुकसान पूरे क्षेत्र को भुगतना पड़ा है। प्रो. गरासिया ने कहा कि अब वे एक राष्ट्रीय पार्टी के साथ जुड़कर भील युवाओं के लिए काम करेंगे, क्षेत्रीय विकास को गति देंगे और जातिवादी राजनीति को समाप्त करने के प्रयासों को आगे बढ़ाएंगे।
क्यों छोड़ी भारत आदिवासी पार्टी? पूर्व नेताओं की नाराजगी के कारण
कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व BAP नेताओं ने साफ कहा कि पार्टी अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। उनका कहना है कि बीएपी का गठन आदिवासी समाज को मजबूत राजनीतिक मंच देने और विकास को गति प्रदान करने के उद्देश्य से हुआ था। लेकिन समय के साथ इसमें व्यक्तिगत स्वार्थ और जातिवादी राजनीति हावी हो गई। पूर्व नेताओं के अनुसार, पार्टी के अंदर कुछ ही लोग फैसले लेते हैं, जिससे शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बढ़ती गई। क्षेत्र में जिन समस्याओं का समाधान होना चाहिए था, वे लगातार अनदेखी होती रहीं। कार्यकर्ताओं को महसूस होने लगा कि पार्टी अब सिर्फ नाम भर की राजनीतिक इकाई बनकर रह गई है, जिसमें भविष्य की स्पष्ट दिशा नहीं है। इन्हीं वजहों से बड़े स्तर पर नेताओं ने सामूहिक रूप से कांग्रेस का दामन थामने का फैसला लिया।
सामूहिक इस्तीफा: कई पदाधिकारी भी कांग्रेस में शामिल
प्रो. गरासिया के साथ कई प्रमुख स्थानीय पदाधिकारी भी बीएपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें बीटीपी जिलाध्यक्ष दिलीप पणदा, गढ़ी ब्लॉक अध्यक्ष नारायण बामणिया, तलवाड़ा अध्यक्ष शंकर मईडा, सनी भाई डेंडोर (ब्लॉक अध्यक्ष, तलवाड़ा ट्राइबल मजदूर संघ), हेनरी पटेल, नितेश कतिजा, मनीष मईडा, पवन बुझ, दिनेश डाबी, गोविंद यादव सहित कई संगठनात्मक चेहरों ने पार्टी बदलने का निर्णय लिया। इन सभी नेताओं ने एक ही स्वर में कहा कि क्षेत्र के विकास और आदिवासी युवाओं के उत्थान के लिए कांग्रेस जैसा बड़ा और राष्ट्रीय स्तर का मंच जरूरी है। उनका मानना है कि कांग्रेस एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था प्रदान करती है जहाँ विचारों को सम्मान और नेतृत्व के साथ संवाद की जगह मिलती है।
राजस्थान की आदिवासी राजनीति में संभावित प्रभाव
राजस्थान में आदिवासी क्षेत्र की राजनीति हमेशा चुनावी परिणामों को प्रभावित करती रही है। बांसवाड़ा, डूंगरपुर और उदयपुर संभाग की कई सीटें ऐसी हैं जो सत्ता की दिशा तय करती हैं। बीएपी इस क्षेत्र में एक उभरती हुई ताकत थी, जिसने पिछले चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया था।
लेकिन इस सामूहिक इस्तीफे ने पार्टी को संगठनात्मक रूप से कमजोर करने के साथ ही उसके भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस इस अवसर को आदिवासी क्षेत्र में अपने आधार को मजबूत करने और आगामी चुनावों के लिए माहौल बनाने में उपयोग कर सकती है।


