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राजस्थान में बड़ा प्रशासनिक बदलाव: 9 नए जिले और 3 संभाग रद्द

राजस्थान में बड़ा प्रशासनिक बदलाव: 9 नए जिले और 3 संभाग रद्द

शोभना शर्मा ।  राजस्थान में राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव की एक नई लहर देखने को मिली है। भजनलाल सरकार ने गहलोत सरकार के कार्यकाल में घोषित 17 नए जिलों में से 9 जिलों को रद्द करने और 3 नए संभागों को समाप्त करने का बड़ा फैसला लिया है। इस निर्णय के बाद प्रदेश में अब कुल 41 जिले और 7 संभाग रह गए हैं। यह बदलाव न केवल प्रशासनिक ढांचे को पुनर्गठित करता है बल्कि प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने पर भी गहरा प्रभाव डालेगा। भजनलाल कैबिनेट के इस फैसले ने राजस्थान की राजनीति और जनता के बीच हलचल पैदा कर दी है।

गहलोत सरकार के दौरान बनाए गए नए जिले और संभाग

गहलोत सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम समय में प्रदेश में 17 नए जिले और 3 नए संभागों का ऐलान किया था। इसका उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाना और क्षेत्रीय विकास को गति देना था। लेकिन इस घोषणा को कई राजनीतिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों ने आलोचना का सामना करना पड़ा।

गहलोत सरकार द्वारा घोषित नए जिलों में से निम्नलिखित को यथावत रखा गया:

  1. बालोतरा
  2. कोटपूतली-बहरोड़
  3. खैरथल-तिजारा
  4. सलूम्बर
  5. बीकानेर ग्रामीण
  6. पाली
  7. जयपुर उत्तर
  8. दौसा ग्रामीण

भजनलाल सरकार का नया फैसला

भजनलाल सरकार ने गहलोत सरकार के फैसलों की समीक्षा करते हुए यह तय किया कि 17 नए जिलों में से केवल 8 जिले ही बने रहेंगे। बाकी 9 जिलों को समाप्त कर दिया गया है। इसके अलावा, नए बनाए गए तीन संभाग (सीकर, पाली और बांसवाड़ा) को भी रद्द कर दिया गया है।

रद्द किए गए जिलों की सूची इस प्रकार है:

  1. दूदू
  2. केकड़ी
  3. शाहपुरा
  4. नीमकाथाना
  5. अनूपगढ़
  6. गंगापुरसिटी
  7. जयपुर ग्रामीण
  8. जोधपुर ग्रामीण
  9. सांचौर

कैबिनेट का तर्क: क्यों लिए गए ये फैसले?

कैबिनेट बैठक के बाद मंत्री जोगाराम पटेल ने स्पष्ट किया कि गहलोत सरकार का 17 नए जिलों का फैसला राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से लिया गया था। उन्होंने बताया कि राजस्थान में लंबे समय तक केवल 26 जिले थे। धीरे-धीरे 7 और जिले जोड़े गए, जिससे संख्या 33 हो गई। लेकिन गहलोत सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में 17 जिलों और 3 संभागों की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि इतने कम समय में नए जिलों और संभागों का गठन करना व्यावहारिक नहीं था। इसके अलावा, इन घोषणाओं से राज्य पर वित्तीय बोझ भी बढ़ गया। भजनलाल सरकार ने इस बोझ को कम करने और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया है।

राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव

भजनलाल सरकार के इस फैसले ने राजस्थान की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है। यह फैसला उन लोगों के लिए निराशाजनक साबित हुआ है, जो नए जिलों और संभागों के गठन से उम्मीद लगाए बैठे थे। गहलोत सरकार द्वारा घोषित नए जिलों के रद्द होने से स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ा है। कई क्षेत्रों के लोग इस फैसले के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वहीं, सरकार का कहना है कि यह कदम प्रशासनिक संरचना को मजबूत करने और प्रदेश की वित्तीय स्थिति को संतुलित रखने के लिए उठाया गया है।

भविष्य की चुनौतियां

यह फैसला हालांकि वित्तीय और प्रशासनिक दृष्टि से फायदेमंद माना जा रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में चुनौतियां भी हैं। नए जिलों और संभागों को लेकर बनी जनता की उम्मीदें टूट सकती हैं। इसके अलावा, राजनीतिक दल इस मुद्दे को आगामी चुनावों में भुनाने की कोशिश कर सकते हैं। भजनलाल सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस फैसले से जनता के हितों को नुकसान न पहुंचे और प्रशासनिक सेवाओं में कोई रुकावट न आए।

भजनलाल सरकार का संदेश

सरकार का कहना है कि राजस्थान का प्रशासनिक भूगोल केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बदला जाना चाहिए। उनका उद्देश्य है कि प्रदेश में प्रशासनिक दक्षता को बढ़ावा दिया जाए और विकास को अधिक प्रभावी बनाया जाए।

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