राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जोधपुर बेंच ने एटीएम कार्ड पर मिलने वाले व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने Axis बैंक को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए मृतक कार्डधारक के नॉमिनी को बीमा राशि देने का आदेश दिया है। यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा और बैंकिंग संस्थाओं की जिम्मेदारी तय करने के लिहाज से अहम माना जा रहा है। आयोग की खंडपीठ, जिसमें सदस्य (न्यायिक) सुरेंद्र सिंह और सदस्य लियाकत अली शामिल थे, ने यह माना कि बैंक ने क्लेम आवेदन को बीमा कंपनी तक नहीं भेजकर गंभीर लापरवाही की है। इस आधार पर बैंक को 2 लाख रुपये की बीमा राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करने के निर्देश दिए गए हैं।
जिला आयोग के फैसले को किया निरस्त
इस मामले में पहले जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जोधपुर-प्रथम ने 5 जून 2023 को परिवाद खारिज कर दिया था। लेकिन राज्य आयोग ने उस आदेश को निरस्त करते हुए नया निर्णय दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण करने पर यह साबित होता है कि बैंक की ओर से सेवा में कमी हुई है।
इस फैसले के साथ ही आयोग ने यह भी कहा कि देरी से एफएसएल रिपोर्ट आना नॉमिनी की गलती नहीं मानी जा सकती, इसलिए केवल देरी के आधार पर क्लेम खारिज करना उचित नहीं है।
हादसे में हुई थी कार्डधारक की मौत
यह मामला जोधपुर के विवेक विहार निवासी भूपेंद्र सिंह की अपील से जुड़ा है। उनके भाई मनोज सिंह शेखावत का एक्सिस बैंक में खाता था और उन्हें वीसा प्लेटिनम एटीएम कार्ड जारी किया गया था। इस कार्ड पर 2 लाख रुपये का व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा कवर उपलब्ध था, जिसमें भूपेंद्र सिंह नॉमिनी थे।
16 जनवरी 2018 को मनोज सिंह घर की छत पर डिश टीवी ठीक करते समय अचानक पैर फिसलने से गिर गए। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद पुलिस में मर्ग रिपोर्ट दर्ज की गई और पोस्टमार्टम कराया गया।
समय पर दी गई थी बैंक को सूचना
अपीलकर्ता के अनुसार, उन्होंने 25 फरवरी 2018 को बैंक शाखा में जाकर दुर्घटना की सूचना दी और बीमा क्लेम के लिए संपर्क किया। इसके बाद 30 मार्च 2018 को सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ क्लेम आवेदन बैंक अधिकारी को सौंप दिया गया। उसी दिन बैंक ने एटीएम कार्ड को स्थायी रूप से ब्लॉक भी कर दिया।
हालांकि, एफएसएल रिपोर्ट और अन्य औपचारिकताओं में देरी हुई, जिसके कारण अंतिम रिपोर्ट दिसंबर 2018 में प्राप्त हुई। अपीलकर्ता ने यह रिपोर्ट जनवरी 2019 में बैंक को सौंप दी, लेकिन बैंक ने 90 दिन की समयसीमा का हवाला देते हुए क्लेम खारिज कर दिया।
आयोग में दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने आयोग के समक्ष तर्क दिया कि क्लेम की सूचना समय पर दे दी गई थी और दस्तावेजों में देरी उनके नियंत्रण से बाहर थी। उन्होंने यह भी कहा कि केवल तकनीकी आधार पर क्लेम खारिज करना उपभोक्ता के साथ अन्याय है।
वहीं बैंक की ओर से यह दलील दी गई कि क्लेम निर्धारित अवधि के बाद प्रस्तुत किया गया, इसलिए नियमों के अनुसार उसे अस्वीकार किया गया। दूसरी ओर बीमा कंपनी ने यह कहा कि उन्हें बैंक की ओर से कोई क्लेम प्राप्त ही नहीं हुआ, इसलिए उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।
बैंक की जिम्मेदारी तय, बीमा कंपनी को राहत
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि बैंक मास्टर पॉलिसी होल्डर था, इसलिए क्लेम को बीमा कंपनी तक पहुंचाना उसकी जिम्मेदारी थी। आयोग ने यह भी गौर किया कि 30 मार्च 2018 को क्लेम प्राप्त होने के बावजूद बैंक ने उसे आगे नहीं भेजा।
रिकॉर्ड में 5 जनवरी 2019 की रिसीविंग सील पर किसी अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं पाए गए, जिससे बैंक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि बैंक द्वारा क्लेम को आगे न भेजना सेवा में कमी के दायरे में आता है। इस आधार पर आयोग ने बीमा कंपनी को दोषमुक्त करार दिया और बैंक को पूरी जिम्मेदारी उठाने के निर्देश दिए।
ब्याज सहित भुगतान का आदेश
राज्य आयोग ने अपने आदेश में एक्सिस बैंक को निर्देश दिया कि वह नॉमिनी को 2 लाख रुपये की बीमा राशि का भुगतान करे। इसके साथ ही 16 मई 2019 से भुगतान की तारीख तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया जाएगा।
इसके अलावा आयोग ने परिवाद और अपील के खर्च के रूप में 10 हजार रुपये अतिरिक्त देने का भी आदेश दिया है। यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
उपभोक्ताओं के लिए अहम संदेश
यह मामला उन सभी बैंक ग्राहकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है, जो एटीएम कार्ड के साथ मिलने वाले बीमा कवर पर निर्भर रहते हैं। आयोग का यह फैसला स्पष्ट करता है कि बैंक केवल सुविधा प्रदान करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें उससे जुड़ी जिम्मेदारियां भी निभानी होती हैं।
अगर बैंक अपनी जिम्मेदारी में लापरवाही बरतते हैं, तो उन्हें इसके लिए जवाबदेह ठहराया जा सकता है। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा।


