मनीषा शर्मा। राजस्थान के अजमेर जिले के पटेल मैदान में शनिवार को दशहरा मेला के अंतर्गत रावण दहन का भव्य आयोजन किया गया। इस वर्ष का आयोजन खास रहा क्योंकि बिना आतिशबाजी के रावण का दहन किया गया, जिससे पर्यावरण और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया। करीब 2 मिनट में ही रावण का प्रतीकात्मक पुतला जलकर खाक हो गया, जिसमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश प्रत्यक्ष हुआ।
विधानसभा अध्यक्ष ने किया प्रतीकात्मक तीर प्रहार
इस आयोजन में अजमेर के गणमान्य नेता और प्रशासनिक अधिकारी भी सम्मिलित हुए। शाम लगभग 6 बजे विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, विधायक अनीता भदेल, और मेयर ब्रजलता हाड़ा ने रावण के पुतले का विधिपूर्वक पूजन किया। कुछ देर बाद श्री रघुनाथ जी की पालकी को विशेष शोभायात्रा के साथ मैदान में लाया गया, जिसके बाद दशानन के अंत की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। श्रीराम के पात्र में सजे व्यक्ति और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने रावण पर तीर दागे और छड़ी से प्रहार कर रावण का अंत किया।
मेघनाथ और कुंभकरण भी हुए धराशायी
श्रीराम और लक्ष्मण ने तीर चलाकर रावण के भाई कुंभकरण और पुत्र मेघनाथ का प्रतीकात्मक वध किया। मैदान में उपस्थित जनसमूह ने इस दृश्य का आनंद लिया और बुराई के प्रतीकात्मक नाश का उत्सव मनाया। रावण का पुतला करीब 2 मिनट में ही जलकर खाक हो गया, जिससे समापन समारोह संपन्न हुआ।
हनुमान ने किया लंका दहन
रावण दहन से पहले आयोजन में हनुमान के पात्र ने लंका को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर उत्सव को जीवंत बनाया। इसके साथ ही रावण के समक्ष एक पुजारी ने विशेष रिती-रिवाजों के साथ छीटे मारे, और इसके बाद दशानन पर तीर दागे गए। जनता ने जय श्रीराम के नारों के साथ दशहरा का जश्न मनाया।
पर्यावरण को ध्यान में रखकर बिना आतिशबाजी का आयोजन
इस बार का आयोजन पर्यावरण के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया। बिना आतिशबाजी के ही रावण दहन किया गया, जो लोगों के बीच एक सकारात्मक संदेश लेकर आया। यह दर्शाता है कि आधुनिक दौर में परंपराओं को सहेजते हुए भी पर्यावरण का सम्मान किया जा सकता है।
दशहरा मेला: सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण
अजमेर का दशहरा मेला राजस्थान के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। इस आयोजन में प्रतिवर्ष हजारों लोग सम्मिलित होते हैं और एकजुट होकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं। इस बार का आयोजन पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए और परंपराओं का सम्मान करते हुए बिना आतिशबाजी के किया गया, जिसने उत्सव को एक नए रूप में प्रस्तुत किया।
इस दशहरा में अच्छाई की जीत का संदेश
यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं बल्कि एक संदेश था कि किसी भी युग में बुराई का नाश और अच्छाई की विजय सदैव संभव है। दशहरे के इस पावन अवसर पर अजमेर की जनता ने एकजुट होकर बुराई के प्रतीक रावण के अंत का जश्न मनाया और समाज को सशक्त एवं सौहार्दपूर्ण संदेश दिया।