राजस्थान की राजनीति में इन दिनों बयानबाजी का दौर तेज हो गया है और नेताओं के शब्दों के तीर अब प्रदेश की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों तक पहुंचते नजर आ रहे हैं। इसी क्रम में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जयपुर स्थित अपने आवास पर मीडिया से बातचीत के दौरान एक साथ कई राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखी। उनके इस बयान ने न केवल प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा की है, बल्कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के भीतर चल रही कथित खींचतान को भी उजागर करने का काम किया है।
गहलोत ने अपने बयान में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का परोक्ष रूप से बचाव करते हुए कहा कि उन्हें किसी प्रकार की सफाई देने की आवश्यकता ही नहीं थी। उन्होंने कहा कि जनता वसुंधरा राजे की भावनाओं और उनके बयान के संदर्भ को भलीभांति समझती है, इसलिए अनावश्यक रूप से सफाई देने की जरूरत नहीं थी। इस टिप्पणी के जरिए गहलोत ने एक ओर जहां भाजपा के वरिष्ठ नेता के प्रति नरम रुख दिखाया, वहीं दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व के भीतर उठे विवादों की ओर भी संकेत किया।
इस दौरान गहलोत ने भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि क्या किसी प्रदेशाध्यक्ष को बार-बार यह कहना चाहिए कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा और कौन नहीं। गहलोत के अनुसार इस तरह के महत्वपूर्ण निर्णय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, जैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के स्तर पर ही लिए जाने चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि इस प्रकार की बयानबाजी पार्टी के भीतर अनुशासन की कमी को दर्शाती है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने भाजपा पर हमला जारी रखते हुए कहा कि जो पार्टी पहले कांग्रेस पर आंतरिक कलह के आरोप लगाती थी, आज वही खुद अंदरूनी मतभेदों से जूझ रही है। गहलोत ने कहा कि भाजपा की स्थिति अब ऐसी हो गई है कि उसके नेता सार्वजनिक मंचों पर अलग-अलग बयान दे रहे हैं, जिससे पार्टी की छवि प्रभावित हो रही है। उन्होंने दावा किया कि इसके विपरीत कांग्रेस राजस्थान में पूरी तरह एकजुट है और प्रदेश की परंपरा के अनुसार आगामी चुनावों में कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना प्रबल है।
गहलोत ने यह भी कहा कि भाजपा के भीतर जिस प्रकार का विरोधाभास सामने आ रहा है, वह न केवल राजनीतिक दृष्टि से बल्कि प्रदेश के विकास के लिए भी उचित नहीं है। उन्होंने मदन राठौड़ को व्यक्तिगत रूप से अच्छा व्यक्ति बताया, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर उनकी भूमिका पर सवाल उठाए। गहलोत के अनुसार जब किसी नेता पर ऊपर से दबाव होता है, तो उसके बयान असंतुलित हो सकते हैं, जो पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित होते हैं।
इस राजनीतिक बयानबाजी के बीच गहलोत ने अपने हालिया ‘पाकिस्तान’ संबंधी बयान को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया और उसका वास्तविक संदर्भ समझा नहीं गया। गहलोत ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य केवल यह बताना था कि दुनिया आज भारत से शांति की उम्मीद करती है। उन्होंने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामाबाद जैसे स्थान से शांति की पहल की बात सामने आती है, तो एक भारतीय होने के नाते उन्हें दुख होता है।
उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान, जिसका इतिहास आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जुड़ा रहा है, वह आज शांति प्रक्रिया में भूमिका निभाने की बात कर रहा है। गहलोत ने इसे भारत के लिए एक चूक बताया और कहा कि यह भूमिका भारत को निभानी चाहिए थी, क्योंकि देश की पहचान अहिंसा, शांति और भाईचारे के मूल्यों से जुड़ी रही है।
इस संदर्भ में उन्होंने इंदिरा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में पाकिस्तान का विभाजन हुआ था और उस समय भारत की वैश्विक स्थिति काफी मजबूत थी। गहलोत के अनुसार आज भी भारत के पास वह क्षमता है कि वह वैश्विक स्तर पर शांति का नेतृत्व कर सके, लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और सही दिशा में प्रयास आवश्यक हैं।
गहलोत ने भाजपा नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके बयान के मर्म को समझने के बजाय उसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि देशहित से जुड़े मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है, ताकि भारत की वैश्विक छवि मजबूत हो सके।


