शोभना शर्मा। राजस्थान की राजनीति एक बार फिर गर्माने वाली है, क्योंकि विधानसभा का मानसून सत्र 1 सितंबर से शुरू हो रहा है और इस बार का सबसे चर्चित मुद्दा ‘एंटी-कन्वर्जन बिल’ हो सकता है। यह वही विधेयक है जिसे पिछले बजट सत्र में पेश तो किया गया था, लेकिन समयाभाव के कारण उस पर बहस और मतदान नहीं हो सका था। अब संकेत मिल रहे हैं कि सरकार इसे हर हाल में पास कराने के मूड में है। अगर यह बिल विधानसभा की मंजूरी पा लेता है, तो यह राजस्थान के इतिहास में धर्म परिवर्तन से जुड़े मामलों पर सबसे कड़ा और निर्णायक कदम साबित होगा।
इस विधेयक का उद्देश्य जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना है। सरकार का मानना है कि लालच, धोखाधड़ी, मानसिक या शारीरिक दबाव डालकर धर्म परिवर्तन कराना न केवल सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी उल्लंघन है। प्रस्तावित बिल में ऐसे अपराधों के लिए सख्त सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है। राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि यह बिल उन घटनाओं पर भी रोक लगाएगा जिन्हें अक्सर ‘लव जिहाद’ के नाम से जोड़ा जाता है।
हालांकि, इसके साथ ही राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होने की संभावना है। सत्ता पक्ष इसे समाज की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के लिए जरूरी बता रहा है, जबकि विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठन इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश मान सकते हैं। कई मानवाधिकार संगठनों का तर्क है कि ऐसे कानून का दुरुपयोग निर्दोष लोगों को फंसाने में किया जा सकता है।
लेकिन मानसून सत्र में सियासी गर्मी केवल ‘एंटी-कन्वर्जन बिल’ तक सीमित नहीं रहने वाली। विधानसभा में इस समय कुल चार विधेयक लंबित हैं, जिनमें से तीन सेलेक्ट कमेटी के पास हैं। इनमें कोचिंग सेंटर विनियमन बिल भी शामिल है, जिस पर हाई कोर्ट ने देरी के लिए सरकार को फटकार लगाई थी। इसके अलावा, भूमि राजस्व (संशोधन) बिल और भूजल प्राधिकरण बिल भी इस सत्र में पास होने की संभावना है।
विपक्ष इस सत्र में सरकार को कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, परिवहन और सामाजिक सेवाओं की स्थिति जैसे कई मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। हाल के दिनों में राज्य में अपराध की घटनाओं में वृद्धि ने कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। इसके साथ ही हालिया प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में सरकार की कथित नाकामी भी विपक्ष के हमलों का हिस्सा होगी।
सत्र में सबसे ज्यादा गरमाने वाला मुद्दा झालावाड़ का दर्दनाक स्कूल हादसा हो सकता है। इस हादसे में स्कूल की इमारत गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत हो गई थी। विपक्ष ने इस घटना की पूरी जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री मदन दिलावर पर डालते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि शिक्षा विभाग की लापरवाही और बजट की कमी के कारण ही यह हादसा हुआ।
स्कूलों की मरम्मत को लेकर भी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षा विभाग ने करीब 8,000 स्कूलों की मरम्मत का प्रस्ताव रखा था, लेकिन बजट की कमी के चलते केवल 2,000 स्कूलों को ही मंजूरी मिल पाई। पिछले वर्ष इस काम के लिए 80 करोड़ रुपये मंजूर हुए थे, जबकि इस साल 175 करोड़ रुपये का प्रस्ताव अब भी अटका हुआ है। विपक्ष का कहना है कि अगर समय पर आवश्यक मरम्मत कार्य पूरे किए जाते, तो झालावाड़ जैसी त्रासदी टाली जा सकती थी।