शोभना शर्मा, अजमेर। दरगाह शरीफ अजमेर में सालाना उर्स के समापन अवसर पर अंजुमन मोइनिया फ़ख़रिया की ओर से मानवता, करुणा और न्याय का सशक्त पैग़ाम दिया गया। उर्स के मौके पर जारी बयान में संगठन ने भारत और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए स्पष्ट कहा कि नफरत, भीड़ हिंसा और धर्म के नाम पर की जा रही हत्याएं इंसानियत और सभी धर्मों की मूल शिक्षाओं के विरुद्ध हैं। अंजुमन ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी समुदाय के साथ होने वाला अत्याचार अस्वीकार्य है और समाज को मिलकर इसके खिलाफ खड़ा होना होगा।
अंजुमन मोइनिया फ़ख़रिया ने सूफी संत हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाओं का हवाला देते हुए कहा कि अजमेर शरीफ का उर्स केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीड़ितों के साथ खड़े होने, समानता, करुणा और आपसी भाईचारे का संदेश देता है। ख्वाजा साहब की शिक्षाओं का मूल भाव यही रहा है कि इंसान को इंसान से जोड़ना ही सच्ची इबादत है, न कि नफरत और हिंसा को बढ़ावा देना।
बयान में विशेष रूप से बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही घटनाओं का उल्लेख किया गया। अंजुमन ने बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की नृशंस हत्या की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह घटना मानवता को शर्मसार करने वाली है। संगठन ने मांग की कि इस मामले में दोषियों को कठोर से कठोर सजा दी जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। अंजुमन ने यह भी कहा कि किसी भी देश की पहचान वहां रहने वाले सभी समुदायों की सुरक्षा और सम्मान से होती है।
भारत के संदर्भ में भी अंजुमन ने हालिया घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की। बयान में बिहार में 5 दिसंबर को मोहम्मद अतहर हुसैन की कथित तौर पर भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या का जिक्र किया गया। इसके साथ ही 24 और 25 दिसंबर को देश के विभिन्न हिस्सों में क्रिसमस आयोजनों के दौरान हुई तोड़फोड़ की घटनाओं को भी लोकतंत्र और कानून के राज पर सीधा हमला बताया गया। अंजुमन ने कहा कि ऐसी घटनाएं समाज में भय का माहौल पैदा करती हैं और आपसी सौहार्द को कमजोर करती हैं।
अंजुमन मोइनिया फ़ख़रिया के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने देशभर की दरगाहों के सज्जादानशीनों, विभिन्न धर्मों के धार्मिक नेताओं और समाज के जिम्मेदार वर्ग से अपील की कि वे नफरत और अत्याचार के खिलाफ एकजुट होकर अपनी नैतिक आवाज बुलंद करें। उन्होंने कहा कि धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल अपने अनुयायियों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में शांति, न्याय और सद्भाव को बनाए रखना भी उनका दायित्व है।
सैयद सरवर चिश्ती ने मुसलमानों से भी अपील की कि वे किसी भी अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से ही विरोध दर्ज कराएं। उन्होंने कहा कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता और सूफी परंपरा हमेशा संयम, संवाद और प्रेम का रास्ता दिखाती है।
अंजुमन ने बांग्लादेश सरकार से, मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में, धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दोषियों को शीघ्र न्याय के कटघरे में लाने की मांग की। साथ ही भारत सरकार से भी कानून व्यवस्था को सख्ती से लागू करने और भीड़ हिंसा जैसी घटनाओं पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने का आग्रह किया गया।
अपने बयान के अंत में अंजुमन मोइनिया फ़ख़रिया ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को दोहराते हुए कहा कि पूरी दुनिया एक परिवार है। संगठन ने अंतरधार्मिक सौहार्द, संवाद और शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि अजमेर शरीफ की सूफी परंपरा हमेशा नफरत के खिलाफ और इंसानियत के पक्ष में खड़ी रहेगी।


