मनीषा शर्मा, अजमेर। महात्मा गांधी की जयंती के मौके पर पूरा देश बापू को याद कर रहा है। उनके जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक रहा चरखा, जो न सिर्फ कपड़ा बनाने का साधन था बल्कि आत्मनिर्भरता, सशक्तिकरण और सम्मान का प्रतीक भी था। गांधी जी मानते थे कि चरखा हर भारतीय को स्वावलंबी बना सकता है। ऐसे ही गांधी के विचारों से प्रेरित होकर अजमेर के मधुकांत वत्स ने दुनिया का सबसे छोटा चरखा तैयार किया। इस चरखे को उन्होंने 2015 में बनाकर लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज करवाया।
13 ग्राम का चरखा, सागवान की लकड़ी से तैयार
अजमेर के रामगंज क्षेत्र में रहने वाले मधुकांत वत्स ने यह चरखा सागवान की लकड़ी से बनाया। इसका वजन मात्र 13 ग्राम 30 मिलीग्राम है। लंबाई 11.9 सेंटीमीटर और चौड़ाई 9 सेंटीमीटर है। इसे बड़े चरखे की तरह ही बनाया गया है, लेकिन आकार बेहद छोटा है। यह सिर्फ शोपीस नहीं है, बल्कि एक वर्किंग मॉडल है जिसे चलाया भी जा सकता है।
17 पार्ट्स जोड़कर बना अद्भुत मॉडल
मधुकांत वत्स बचपन से ही गांधी जी और उनके विचारों से प्रभावित रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके चरखे का हर हिस्सा गांधी जी के मूल चरखे से मेल खाता है। गांधी जी का असली चरखा लगभग 3 फीट लंबा होता था। वत्स ने अपने चरखे में करीब 17 छोटे लकड़ी के पार्ट्स जोड़कर इसे तैयार किया। इसे बनाने में उन्हें लगभग 3 महीने का समय लगा। इस चरखे को जरूरत पड़ने पर पूरा खोलकर फिर से जोड़ा भी जा सकता है।
शार्पनर से छिली पेंसिल से चलता है छोटा चरखा
इस छोटे चरखे की खासियत यह है कि इसे हाथ से नहीं चलाया जा सकता। इसे चलाने के लिए शार्पनर से छिली हुई पेंसिल का उपयोग करना पड़ता है। वत्स ने इसमें लकड़ी और पीतल दोनों का इस्तेमाल किया है। उनका कहना है कि जैसे बड़े चरखे को उंगलियों से घुमाया जाता है, वैसे ही इस छोटे चरखे को खास तकनीक से चलाया जा सकता है।
बचपन का सपना और पंडित की भविष्यवाणी
मधुकांत वत्स ने बताया कि जब वह छोटे थे तब उनके माता-पिता को एक पंडित ने कहा था कि उनका बेटा दुनिया में नाम कमाएगा। यह बात उनके दिमाग में बैठ गई थी। उन्होंने सोचा कि ऐसा कुछ अनोखा काम करें जिससे सचमुच दुनिया में पहचान बने। चूंकि उनका परिवार और शिक्षा दोनों ही गांधी जी और चरखे से जुड़ी बातें करते रहते थे, इसलिए उन्होंने ठाना कि वे दुनिया का सबसे छोटा चरखा बनाएंगे। आखिरकार 2015 में उनका यह सपना पूरा हुआ।
हैंडीक्राफ्ट का जुनून और जीवन की यात्रा
मधुकांत वत्स बचपन से ही हैंडीक्राफ्ट के शौकीन रहे हैं। उन्होंने 6वीं कक्षा से ही कागज पर डिजाइन और मॉडल बनाना शुरू कर दिया था। उन्होंने अजमेर के सेंट पॉल स्कूल से पढ़ाई की। डीएवी कॉलेज से M.Com (Business Administration) किया। 1976 से वे लकड़ी पर काम कर हैंडीक्राफ्ट तैयार कर रहे हैं। 2014 में उनकी पत्नी का निधन हो गया। उनकी बेटी मुंबई में रहती है। वर्तमान में वे अजमेर में ही रहकर हैंडीक्राफ्ट का काम कर रहे हैं।
अब सबसे छोटी कार और चंद्रयान बनाने का सपना
चरखे के बाद मधुकांत वत्स ने खुद को यहीं नहीं रोका। उन्होंने बताया कि अब वे देश की 10 सबसे छोटी कारें बनाने में जुटे हुए हैं। इन कारों को अलग-अलग नाम दिए गए हैं। इसके अलावा वे चंद्रयान-3 का मॉडल भी तैयार कर रहे हैं, जिसे वे वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवाना चाहते हैं।
गांधी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक
गांधी जी के लिए चरखा महज कपड़ा बनाने का साधन नहीं था। वे इसे आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक मानते थे। उनके अनुसार, अगर हर भारतीय चरखे पर काम करेगा तो विदेशी कपड़े पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। मधुकांत वत्स का यह छोटा चरखा उसी विचारधारा को आगे बढ़ाता है। यह हमें याद दिलाता है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े संदेश दे सकते हैं।
महात्मा गांधी की जयंती पर जब पूरा देश उन्हें याद कर रहा है, तब अजमेर के मधुकांत वत्स का यह योगदान बेहद खास हो जाता है। उनका बनाया दुनिया का सबसे छोटा चरखा न केवल रिकॉर्ड बुक में दर्ज है बल्कि यह गांधी जी के आत्मनिर्भरता के विचार को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रहा है।


