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दरगाह पर शिव मंदिर के दावे के बीच 813वें उर्स की तैयारियां

दरगाह पर शिव मंदिर के दावे के बीच 813वें उर्स की तैयारियां

शोभना शर्मा, अजमेर। विश्व प्रसिद्ध ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। दरगाह को लेकर हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दावा किया है कि यह स्थल पहले शिव मंदिर था। इस संबंध में उन्होंने अदालत में वाद दायर किया है, जिसकी सुनवाई 20 दिसंबर को होनी है। हालांकि, इन विवादों के बीच दरगाह पर हर साल होने वाले उर्स की तैयारियां जोरों पर हैं।

दरगाह पर शिव मंदिर होने का दावा और कानूनी विवाद

अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने निचली अदालत में एक वाद दायर किया। इस वाद में उन्होंने दावा किया कि दरगाह की जगह पर पहले एक शिव मंदिर था। इस दावे को लेकर अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और 20 दिसंबर को मामले की सुनवाई निर्धारित की गई है।

दरगाह के खादिमों ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि यह विवाद उर्स के माहौल को प्रभावित करने का प्रयास है। दरगाह के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने कहा, “यहां का माहौल हमेशा की तरह शांत और सौहार्दपूर्ण है। इस विवाद का दरगाह पर कोई असर नहीं पड़ा है। ख्वाजा गरीब नवाज के दर पर हर धर्म और जाति के लोग आते हैं, और यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।”

813वें उर्स की तैयारियां जोरों पर

हर साल की तरह इस साल भी ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के 813वें उर्स की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। उर्स का आयोजन इस्लामिक महीने रजब की पहली तारीख से नौवीं तारीख तक किया जाता है। इस साल उर्स 2 जनवरी 2024 से शुरू होगा और 28 दिसंबर 2023 को दरगाह पर झंडा चढ़ाने की रस्म अदा की जाएगी। उर्स के दौरान कई महत्वपूर्ण रस्में जैसे गुस्ल, चादर पेश करना, और कव्वालियां होती हैं। इसके अलावा, जायरीन ख्वाजा साहब की मजार पर चादर चढ़ाकर अपनी मन्नतें मांगते हैं। इस साल भी लाखों जायरीन के आने की उम्मीद है।

उर्स की महत्ता और खासियत

ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती का उर्स भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े सूफी आयोजनों में से एक है। इसमें हर साल लाखों लोग हिस्सा लेते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यहां आने वाले जायरीन ख्वाजा साहब से अपनी दुआओं के लिए प्रार्थना करते हैं और शांति व सौहार्द का संदेश लेकर लौटते हैं। दरगाह के खादिमों की संस्था “अंजुमन सैयद जादगान” इस आयोजन को सफल बनाने के लिए विशेष तैयारियां कर रही है। उर्स के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ जायरीन के ठहरने और खानपान की व्यवस्था की जाती है।

विवाद के बीच सौहार्द का संदेश

दरगाह के खादिमों का कहना है कि शिव मंदिर होने का दावा और कानूनी वाद का असर दरगाह के कामकाज और उर्स पर नहीं पड़ेगा। सैयद सरवर चिश्ती ने कहा, “ख्वाजा साहब की दरगाह सभी धर्मों और जातियों के लोगों के लिए है। यह स्थान प्यार, शांति और भाईचारे का प्रतीक है। हर साल की तरह इस बार भी उर्स पूरी शांति और धूमधाम के साथ मनाया जाएगा।”

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