देश में बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है। घर खरीदने से लेकर वाहन, शिक्षा, व्यवसाय और व्यक्तिगत जरूरतों तक के लिए बड़ी संख्या में लोग बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों (NBFCs) से ऋण लेते हैं। हालांकि आर्थिक परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं और कई बार नौकरी छूटने, व्यापार में नुकसान, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं या अन्य वित्तीय संकटों के कारण लोग समय पर अपनी ईएमआई या ऋण की किस्तें जमा नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में अक्सर ऋण वसूली के लिए नियुक्त रिकवरी एजेंटों और थर्ड पार्टी एजेंसियों की भूमिका सामने आती है। दुर्भाग्यवश कई मामलों में इन एजेंटों पर कर्जदारों के साथ दुर्व्यवहार, धमकी, मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक रूप से अपमानित करने के आरोप भी लगते रहे हैं।
वित्तीय और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अनेक उधारकर्ताओं को अपने अधिकारों की पर्याप्त जानकारी नहीं होती, जिसके कारण वे रिकवरी एजेंटों की अनुचित गतिविधियों का विरोध नहीं कर पाते। दूसरी ओर शिकायतें मिलने के बावजूद कई बार बैंक और वित्तीय संस्थान समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करते। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ऋण वसूली प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जिम्मेदार बनाने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऋण वसूली की प्रक्रिया कानून और शिष्टाचार की सीमाओं के भीतर ही संचालित हो।
RBI के फेयर प्रैक्टिसेस कोड के अनुसार रिकवरी एजेंटों के लिए स्पष्ट आचार संहिता निर्धारित की गई है। इसके तहत एजेंट केवल निर्धारित समय सीमा के भीतर ही उधारकर्ताओं से संपर्क कर सकते हैं। उन्हें सुबह 8 बजे से पहले और शाम 7 बजे के बाद कॉल या व्यक्तिगत संपर्क करने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा बार-बार फोन कर परेशान करना, डराने-धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल करना, गाली-गलौज करना या मानसिक दबाव बनाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। बैंकिंग नियामक का मानना है कि ऋण वसूली एक कानूनी प्रक्रिया है और इसे किसी भी परिस्थिति में उत्पीड़न का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
नियमों के अनुसार रिकवरी एजेंट उधारकर्ता के परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों या कार्यस्थल पर मौजूद सहकर्मियों से संपर्क कर उसकी वित्तीय स्थिति सार्वजनिक नहीं कर सकते। किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से शर्मिंदा करना या उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना भी नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। वर्तमान डिजिटल युग को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी उधारकर्ता के बारे में जानकारी साझा करना या उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करना भी प्रतिबंधित गतिविधियों की श्रेणी में रखा गया है।
RBI ने हाल ही में जिम्मेदार व्यवसायिक आचरण से जुड़े दो महत्वपूर्ण ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं, जो 1 जुलाई 2026 से लागू होने वाले हैं। इन नए प्रावधानों का उद्देश्य ऋण वसूली प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करना है। नए नियमों के अनुसार किसी भी रिकवरी एजेंट को ऋण वसूली के लिए व्यक्तिगत मुलाकात के दौरान कुछ अनिवार्य दस्तावेज साथ रखने होंगे। इनमें रिकवरी नोटिस की प्रति, संबंधित बैंक या एजेंसी का पहचान पत्र तथा बैंक द्वारा जारी अधिकृत प्राधिकरण पत्र शामिल है। इस प्राधिकरण पत्र में रिकवरी एजेंट के साथ-साथ बैंक के शिकायत निवारण अधिकारी का मोबाइल नंबर भी दर्ज होना आवश्यक होगा।
नए नियमों में मानवीय संवेदनाओं को भी विशेष महत्व दिया गया है। इसके तहत विवाह समारोह, धार्मिक त्योहारों या परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु जैसी परिस्थितियों के दौरान ऋण वसूली के लिए दबाव बनाने या घर पहुंचने पर रोक लगाई गई है। RBI का मानना है कि ऐसे अवसरों पर किसी व्यक्ति को मानसिक तनाव में डालना अनुचित और असंवेदनशील व्यवहार माना जाएगा।
यदि कोई रिकवरी एजेंट इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उधारकर्ता के पास शिकायत दर्ज कराने के कई विकल्प उपलब्ध हैं। सबसे पहले संबंधित बैंक या NBFC के शिकायत निवारण प्रकोष्ठ में लिखित शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। प्रत्येक बैंक और वित्तीय संस्था के लिए शिकायतों का निपटारा करना अनिवार्य है। यदि निर्धारित अवधि में उचित समाधान नहीं मिलता है तो मामला RBI के बैंकिंग ओम्बड्समैन अर्थात बैंकिंग लोकपाल के समक्ष भी ले जाया जा सकता है। गंभीर मामलों में जहां धमकी, मारपीट या अन्य आपराधिक गतिविधियों की आशंका हो, वहां पुलिस में शिकायत या एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार भी उधारकर्ता को प्राप्त है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऋण भुगतान में कठिनाई आने पर सबसे महत्वपूर्ण कदम समस्या को छिपाने के बजाय समय रहते बैंक से संवाद स्थापित करना है। अक्सर लोग ईएमआई चूकने के बाद बैंक के कॉल से बचने लगते हैं, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है। वित्तीय सलाहकारों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति समय पर बैंक को अपनी आर्थिक स्थिति की जानकारी देता है तो उसके लिए कई वैकल्पिक समाधान उपलब्ध हो सकते हैं।
ऐसे मामलों में सबसे पहला विकल्प लोन रिस्ट्रक्चरिंग का होता है। इसके तहत बैंक ऋण की अवधि बढ़ाकर या मासिक किस्तों की राशि कम करके उधारकर्ता को राहत प्रदान कर सकता है। इससे मासिक वित्तीय बोझ कम हो जाता है और व्यक्ति अपने भुगतान को नियमित बनाए रख सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण विकल्प ऋण से जुड़े बीमा कवरेज की समीक्षा करना है। कई बैंक और वित्तीय संस्थान ऋण के साथ बीमा सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। यदि उधारकर्ता की नौकरी चली गई हो, कोई गंभीर दुर्घटना हुई हो या चिकित्सा आपातकाल की स्थिति उत्पन्न हुई हो, तो ऐसी परिस्थितियों में बीमा योजना कुछ हद तक आर्थिक राहत प्रदान कर सकती है।
तीसरा विकल्प वन टाइम सेटलमेंट यानी एकमुश्त समझौता है। इसमें बैंक और उधारकर्ता आपसी सहमति से बकाया राशि के एक हिस्से का भुगतान कर खाते को बंद करने पर सहमत हो सकते हैं। हालांकि यह विकल्प परिस्थितियों और बैंक की नीतियों पर निर्भर करता है, लेकिन गंभीर वित्तीय संकट में यह कई लोगों के लिए उपयोगी समाधान साबित हो सकता है।
बढ़ते ऋण बाजार और डिजिटल बैंकिंग के दौर में RBI के नए नियम उधारकर्ताओं के अधिकारों को अधिक मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। इन नियमों से न केवल रिकवरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि ऋण लेने वाले लोगों को भी यह भरोसा मिलेगा कि आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके साथ सम्मानजनक और कानूनी व्यवहार किया जाएगा। साथ ही यह संदेश भी स्पष्ट होगा कि ऋण वसूली का अधिकार बैंकों के पास जरूर है, लेकिन यह प्रक्रिया कानून, नैतिकता और मानव गरिमा की सीमाओं के भीतर ही संचालित की जानी चाहिए।


