राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ बड़ा अभियान छेड़ते हुए साफ संकेत दिया है कि राज्य सरकार अब भ्रष्ट अधिकारियों के प्रति किसी भी तरह की नरमी बरतने के मूड में नहीं है। सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत पिछले ढाई वर्षों में एक आईएएस अधिकारी समेत कुल 103 अधिकारियों को निलंबित किया गया है। इसके अलावा छह अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया, जबकि 11 अधिकारियों की आजीवन पेंशन रोकने जैसी कठोर कार्रवाई भी की गई है। राज्य सरकार ने रिश्वतखोरी, पद के दुरुपयोग और आय से अधिक संपत्ति के 108 मामलों में अभियोजन स्वीकृति देकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने सख्त रुख को और स्पष्ट कर दिया है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कई मौकों पर यह दोहराया है कि आम जनता को पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन उपलब्ध कराना उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। सरकार का मानना है कि यदि प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही तय नहीं की गई तो आमजन का भरोसा कमजोर होगा। यही वजह है कि राज्य सरकार ने केवल निलंबन तक सीमित न रहते हुए कई मामलों में अधिकारियों को सीधे सेवा से बाहर करने का फैसला लिया है।
सरकार द्वारा जारी कार्रवाई के तहत जिन अधिकारियों को न्यायालय में दोष सिद्ध होने के बाद बर्खास्त किया गया है, उनमें कई विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। इनमें पीडब्ल्यूडी के तत्कालीन विकास अधिकारी भरत प्रकाश मेघवाल, कृषि विभाग के तत्कालीन उप निदेशक राजेश कुमार नैनावत और वित्त कर विभाग के तत्कालीन सहायक आयुक्त महावीर सिंह आसीवाल के नाम प्रमुख हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कई अधिकारियों पर भी कार्रवाई की गई है। चिकित्सा अधिकारी डॉ. राम मोहन सिंह चौहान, डॉ. मुरलीधर शर्मा और डॉ. मनोहर लाल को भी सेवा से बर्खास्त किया गया है।
राज्य सरकार का कहना है कि जिन अधिकारियों के खिलाफ रिश्वत, भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग के मामलों में अदालत में दोष सिद्ध हुआ, उनके खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की गई। सरकार ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी पाए जाने वाले किसी भी अधिकारी को सेवा में बने रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने यह भी कहा है कि जनता के टैक्स के पैसे का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जारी रहेगी। उनका कहना है कि जो अधिकारी अपने पद का गलत इस्तेमाल करेगा, वह न तो नौकरी बचा पाएगा और न ही पेंशन का लाभ ले सकेगा। इसी नीति के तहत राज्य सरकार ने 11 अधिकारियों की आजीवन शत-प्रतिशत पेंशन रोक दी है।
इन अधिकारियों में नगर विकास न्यास अलवर के तत्कालीन उप सचिव बनवारी लाल मीणा और उप सचिव देवेन्द्र सिंह ढिल्लो के अलावा वरिष्ठ चिकित्साधिकारी डॉ. शिवनारायण यादव तथा विकास अधिकारी मनोहर लाल सिसोदिया शामिल हैं। इनके अलावा चिकित्सा, पीडब्ल्यूडी, पुलिस और पशुपालन विभाग से जुड़े कई अधिकारियों पर भी पेंशन रोकने जैसी बड़ी कार्रवाई की गई है। सरकार का मानना है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी अधिकारियों को जवाबदेह ठहराना जरूरी है, ताकि भविष्य में अन्य अधिकारियों के लिए भी यह कड़ा संदेश बन सके।
राज्य सरकार ने हाल ही में पेयजल गुणवत्ता जांच में फर्जी रिपोर्ट तैयार करने के मामले में भी बड़ी कार्रवाई की। पीएचईडी की अलवर प्रयोगशाला में कार्यरत वरिष्ठ रसायनज्ञ प्रदीप कुमार हजरती पर आरोप लगा कि उन्होंने पेयजल नमूनों की गुणवत्ता जांच में गंभीर लापरवाही बरती और फर्जी रिपोर्ट तैयार की। मुख्यमंत्री ने इसे जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मामला मानते हुए संबंधित अधिकारी को तत्काल सेवा से बाहर करने का निर्देश दिया।
इसी तरह भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की कार्रवाई में दोषी पाए गए अधिकारियों के खिलाफ भी सख्ती दिखाई गई है। कोटा में एसीबी कोर्ट से सजा मिलने के बाद तत्कालीन एपीपी हरिसिंह मीना को नौकरी से हटा दिया गया। सरकार का कहना है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाएगा।
राजस्थान सरकार ने कुछ मामलों में अनिवार्य सेवानिवृत्ति और अभियोजन स्वीकृति जैसे कदम भी उठाए हैं। झालावाड़ के तत्कालीन वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. विलास राव गुल्हाने को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई है। वहीं जैसलमेर में आईजीएनपी परियोजना से जुड़े अधिशाषी अभियंता देशराज नूनिया की आजीवन पेंशन रोक दी गई है।
इसके अलावा कई अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति भी जारी की गई है। इनमें तत्कालीन एसडीएम देवी सिंह, बीसीएमओ डॉ. पवन कुमार जैन, पीएचईडी के कई इंजीनियर और राजस्थान जलप्रदाय एवं सीवरेज बोर्ड के अधिकारी शामिल हैं। इन अधिकारियों पर रिश्वत, वित्तीय अनियमितता और पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस कार्रवाई को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सख्त प्रशासनिक शैली के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का दावा है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। साथ ही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और सतर्कता एजेंसियों को भी सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश दिए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि यह भी जरूरी होगा कि जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे ताकि ईमानदार अधिकारियों का मनोबल प्रभावित न हो।
फिलहाल राजस्थान सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने अभियान को और तेज करने की तैयारी में दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि राज्य में सुशासन और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जाएगी तथा भ्रष्टाचार में शामिल किसी भी अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा।


