राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा नाबालिग से दुष्कर्म मामले में सजा बरकरार रखने के फैसले के बाद स्वयंभू संत आसाराम एक बार फिर चर्चा में आ गया है। हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने उसकी अंतरिम जमानत रद्द करते हुए तत्काल गिरफ्तारी के आदेश जारी किए, जिसके बाद आसाराम जोधपुर पहुंचा और अंततः सेंट्रल जेल में सरेंडर कर दिया। कोर्ट के इस फैसले को देश के चर्चित आपराधिक मामलों में एक अहम कानूनी पड़ाव माना जा रहा है।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद आसाराम बुधवार देर शाम हरिद्वार से दिल्ली के लिए रवाना हुआ और इसके बाद जोधपुर पहुंचा। उसके जोधपुर आने की सूचना मिलते ही एयरपोर्ट पर समर्थकों की भीड़ जमा हो गई। एयरपोर्ट से वह सीधे पाल गांव स्थित अपने आश्रम गया। इसके बाद स्वास्थ्य जांच के लिए उसे एम्स ले जाया गया, जहां चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसने जोधपुर सेंट्रल जेल में आत्मसमर्पण कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को सही ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आसाराम को दी गई सजा उसके प्राकृतिक जीवन के अंत तक जारी रहेगी। हालांकि कोर्ट ने उसे गैंगरेप और आपराधिक साजिश जैसे कुछ आरोपों से राहत दी, लेकिन बलात्कार के मुख्य आरोप में दोषसिद्धि कायम रहने से उसकी कानूनी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।
यह फैसला न्यायाधीश अरुण मोंगा और योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने सुनाया। दोनों न्यायाधीशों ने 92 पृष्ठों का विस्तृत निर्णय जारी करते हुए मामले के विभिन्न पहलुओं पर टिप्पणी की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि रात के समय एक नाबालिग लड़की को अकेले बुलाना स्वयं आरोपी के इरादों को स्पष्ट करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्दोष व्यक्ति अंधेरे और बंद दरवाजों की आड़ नहीं तलाशता।
खंडपीठ ने मामले में सह-अभियुक्त हॉस्टल वार्डन संचिता उर्फ शिल्पी और शरद चंद्र को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि यह साबित नहीं हो सका कि दोनों को आसाराम के वास्तविक इरादों की जानकारी थी। निचली अदालत ने दोनों को 20-20 साल की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर उन्हें राहत दे दी।
अदालत ने आईपीसी की धारा 376(2)(एफ) के तहत भरोसे की स्थिति का दुरुपयोग कर बलात्कार करने के अपराध में आसाराम को दोषी माना। इसके अलावा धारा 342, 370(4), 506 और पोक्सो एक्ट की धारा 7/8 के तहत भी दोषसिद्धि बरकरार रखी गई। हालांकि धारा 376डी यानी सामूहिक दुष्कर्म, धारा 120बी यानी आपराधिक साजिश और पोक्सो एक्ट की धारा 5(ग)/6 के तहत उसे बरी कर दिया गया।
यह मामला वर्ष 2013 का है, जब पीड़िता की उम्र करीब 16 वर्ष थी। वह मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा स्थित आसाराम के गुरुकुल में पढ़ाई कर रही थी। मामले के अनुसार गुरुकुल में पढ़ाई के दौरान पीड़िता की तबीयत खराब रहने लगी और उसे चक्कर आने की शिकायत हुई। इसके बाद हॉस्टल वार्डन ने पीड़िता के माता-पिता को बताया कि उनकी बेटी पर कथित रूप से भूत-प्रेत का साया है और इसका इलाज केवल आसाराम कर सकता है।
इसी विश्वास में पीड़िता के माता-पिता उसे लेकर 14 अगस्त 2013 को जोधपुर के मनाई स्थित आश्रम पहुंचे। अगले दिन सत्संग के बाद आसाराम ने पीड़िता को अकेले मिलने के लिए बुलाया। आरोपों के अनुसार वह उसे अपनी कुटिया में ले गया, दरवाजा बंद किया और उसके साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता ने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन उसे धमकाया गया। आरोप था कि यदि उसने किसी को बताया तो उसके परिवार को नुकसान पहुंचाया जाएगा।
घटना के बाद पीड़िता कई दिनों तक मानसिक दबाव में रही और चुप रही। बाद में उसने 19 अगस्त 2013 को अपनी मां को पूरी घटना बताई। इसके बाद मामला दिल्ली से जोधपुर स्थानांतरित किया गया और 21 अगस्त 2013 को केस दर्ज हुआ। पुलिस जांच के बाद 1 सितंबर 2013 को आसाराम को गिरफ्तार कर लिया गया था।
इस मामले ने उस समय देशभर में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा कर दिया था। वर्षों तक चली सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के बाद निचली अदालत ने आसाराम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अब हाईकोर्ट द्वारा भी सजा बरकरार रखने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत ने मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और पीड़िता के बयान को पर्याप्त माना है।
जोधपुर में आसाराम के जेल पहुंचने के बाद सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई है। पुलिस प्रशासन पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है और न्याय व्यवस्था में पीड़िता की लड़ाई को एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।


