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आसाराम को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, उम्रकैद बरकरार

आसाराम को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, उम्रकैद बरकरार

नाबालिग से दुष्कर्म मामले में स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। Rajasthan High Court की जोधपुर मुख्यपीठ ने उनके खिलाफ निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने न केवल उनकी अंतरिम जमानत तुरंत प्रभाव से रद्द कर दी, बल्कि बिना किसी अतिरिक्त समय दिए तत्काल गिरफ्तारी वारंट भी जारी कर दिया। कोर्ट के आदेश के बाद अब आसाराम को हर हाल में जेल जाना होगा।

करीब 92 पन्नों के विस्तृत फैसले में अदालत ने मामले के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से टिप्पणी की है। कोर्ट ने पीड़िता की गवाही, मेडिकल रिपोर्ट, उम्र से जुड़े विवाद, एफआईआर में देरी और बचाव पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों पर विस्तार से विचार करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही माना। हालांकि अदालत ने सह-आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश साबित नहीं होने के कारण उन्हें राहत दी।

यह मामला अगस्त 2013 का है, जब जोधपुर स्थित आश्रम में एक नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म के आरोप में आसाराम को गिरफ्तार किया गया था। पीड़िता उस समय मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा स्थित गुरुकुल में पढ़ती थी और कक्षा 12 की छात्रा थी। आरोप था कि 15 अगस्त 2013 की रात जोधपुर के मणई गांव स्थित आश्रम में उसके साथ यौन शोषण किया गया। लंबे ट्रायल के बाद 25 अप्रैल 2018 को जोधपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने आसाराम को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

आसाराम ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। राजस्थान हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई फरवरी से अप्रैल 2026 तक लगातार हुई। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि पीड़िता के बयान विश्वसनीय हैं और उन्हें केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी मौजूद नहीं था।

कोर्ट ने माना कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता का स्पष्ट और भरोसेमंद बयान अपने आप में महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। अदालत ने यह भी कहा कि बंद कमरे में हुई ऐसी घटनाओं में हर बार प्रत्यक्ष गवाह की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। फैसले में कहा गया कि पीड़िता ने पूरे मामले में लगातार एक समान बयान दिया और लंबे समय तक हुई जिरह के बावजूद उसके मुख्य आरोपों को कमजोर नहीं किया जा सका।

मामले में मेडिकल रिपोर्ट को लेकर भी बचाव पक्ष ने कई तर्क दिए थे। रिपोर्ट में शरीर पर बाहरी चोटों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था और हाइमन सुरक्षित पाया गया था। हालांकि अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार यौन शोषण केवल शारीरिक चोटों से ही साबित नहीं होता। यदि किसी नाबालिग के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन कृत्य या यौन उत्पीड़न किया जाता है, तो वह भी दुष्कर्म की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के सुसंगत बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्य इस अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।

पीड़िता की उम्र को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया था। बचाव पक्ष का दावा था कि घटना के समय लड़की बालिग थी। इसके समर्थन में एक पुराने रजिस्टर की एंट्री अदालत में पेश की गई। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि उस रिकॉर्ड में बाद में बदलाव किए गए थे। अदालत ने दसवीं कक्षा के मूल प्रमाणपत्र को सबसे विश्वसनीय दस्तावेज माना, जिसमें जन्मतिथि दर्ज थी। इसके आधार पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी और पॉक्सो एक्ट के प्रावधान पूरी तरह लागू होते हैं।

मामले में एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी को लेकर भी बचाव पक्ष ने सवाल उठाए थे। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि एक नाबालिग लड़की, जो अपने परिवार के पूजनीय गुरु के खिलाफ शिकायत कर रही हो, उसके लिए मानसिक रूप से यह कदम उठाना आसान नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि सदमे और भय की स्थिति में कुछ समय लगना स्वाभाविक है। अदालत ने यह भी माना कि परिवार पहले आसाराम से मिलने दिल्ली गया था और बाद में वहीं जीरो एफआईआर दर्ज करवाई गई, ताकि मामले में और देरी न हो।

बचाव पक्ष ने यह भी आरोप लगाया था कि यह मामला 50 करोड़ रुपए की कथित उगाही के लिए रचा गया षड्यंत्र था। हाईकोर्ट ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि यह पहले से तैयार की गई साजिश होती तो पीड़िता का परिवार सीधे पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज करवाता। दिल्ली जाकर जीरो एफआईआर दर्ज कराने और फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना किसी पूर्व नियोजित साजिश से मेल नहीं खाता।

फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता सहानुभूति नहीं बल्कि न्याय चाहती है। अदालत ने टिप्पणी की कि दोषी के लिए जेल की सजा केवल भौतिक सीमाओं तक सीमित होती है, लेकिन पीड़िता को जो मानसिक आघात झेलना पड़ा, उसकी पीड़ा आजीवन रहती है। इसी आधार पर अदालत ने आसाराम की उम्र को राहत का आधार मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि 86 वर्ष की आयु अपने आप में दया का आधार नहीं बन सकती, खासकर तब जब अपराध बेहद गंभीर प्रकृति का हो।

हालांकि हाईकोर्ट ने इस मामले में सह-आरोपियों शिल्पी और शरत चंद्र को राहत देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि यह साबित नहीं हो सका कि उन्हें पहले से इस अपराध की जानकारी थी या वे किसी आपराधिक साजिश का हिस्सा थे। कोर्ट के अनुसार केवल किसी व्यक्ति को आश्रम भेजने की सलाह देना तब तक साजिश नहीं माना जा सकता, जब तक अपराध की पूर्व जानकारी सिद्ध न हो।

इस मामले में अभियोजन पक्ष ने कुल 44 गवाह पेश किए थे, जिनमें पीड़िता, उसके माता-पिता, डॉक्टर और जांच अधिकारी शामिल थे। बचाव पक्ष की ओर से 31 गवाह अदालत में पेश किए गए। लंबी सुनवाई और गहन जिरह के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।

अब कानूनी रूप से आसाराम के पास सर्वोच्च न्यायालय जाने का विकल्प मौजूद है। हालांकि हाईकोर्ट द्वारा अंतरिम जमानत रद्द किए जाने के बाद फिलहाल उन्हें जेल में ही रहना होगा। यदि सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिलती, तो उम्रकैद की सजा जारी रहेगी।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार हाईकोर्ट द्वारा इस फैसले को “रिपोर्टेबल” घोषित करना भी महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि भविष्य में समान मामलों में यह फैसला एक कानूनी उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। अदालत ने अपने निर्णय के जरिए यह स्पष्ट संदेश दिया है कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की गरिमा, मानसिक स्थिति और न्याय की आवश्यकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

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