राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। राज्य में लंबे समय से लंबित स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलचल लगातार बढ़ती जा रही है। इसी बीच पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल कर बड़ा कदम उठाया है। इस याचिका में उन्होंने आग्रह किया है कि यदि राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया आदेश के खिलाफ राज्य सरकार या कोई अन्य पक्ष सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करता है, तो अदालत उनका पक्ष सुने बिना कोई एकतरफा आदेश पारित न करे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 22 मई को राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को निर्देश देते हुए आगामी 31 जुलाई तक पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि सरकार ने चुनाव कराने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रखे जा सकते और समय पर चुनाव कराना संवैधानिक जिम्मेदारी है।
इस पूरे मामले की शुरुआत उस समय हुई थी जब पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और Giriraj Singh Devanda ने चुनावों में हो रही देरी को लेकर जनहित याचिका दायर की थी। इससे पहले 14 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने इस याचिका का निस्तारण करते हुए राज्य सरकार और चुनाव आयोग को 15 अप्रैल तक चुनाव कराने की समय सीमा निर्धारित की थी। हालांकि तय समयसीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी, जिसके बाद मामला फिर अदालत पहुंचा और अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत के सामने कई प्रशासनिक और तकनीकी चुनौतियों का हवाला दिया। सरकार की ओर से कहा गया कि वार्ड परिसीमन की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है और ओबीसी आयोग की रिपोर्ट भी लंबित है। सरकार ने अदालत को बताया कि इन प्रक्रियाओं के बिना चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा। इसी आधार पर सरकार ने चुनाव करवाने के लिए दिसंबर 2026 तक का समय मांगा था। सरकार का तर्क था कि राज्य में कई पंचायत समितियों और जिला परिषदों का कार्यकाल सितंबर से दिसंबर के बीच समाप्त होने वाला है, इसलिए सभी चुनाव एक साथ करवाना अधिक उपयुक्त रहेगा।
राज्य सरकार ने अदालत में “वन स्टेट-वन इलेक्शन” की अवधारणा का भी उल्लेख किया था। सरकार का कहना था कि यदि विभिन्न स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग समय पर करवाए जाएंगे तो प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। एक साथ चुनाव कराने से समय, धन और प्रशासनिक संसाधनों की बचत होगी तथा पूरे राज्य में एक समान चुनाव प्रक्रिया लागू की जा सकेगी। हालांकि हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना और समयबद्ध चुनाव कराने के निर्देश जारी कर दिए।
इस मामले में राज्य चुनाव आयोग की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी रही। अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग ने अदालत में बिना शर्त माफी मांगी। आयोग की ओर से कहा गया कि वह चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार था, लेकिन राज्य सरकार द्वारा परिसीमन, आरक्षण और प्रशासनिक आंकड़ों से संबंधित जरूरी जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं करवाई गई। आयोग ने अदालत को बताया कि डेटा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी के कारण चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया जा सका।
राजस्थान में इस बार स्थानीय निकाय चुनाव पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़े स्तर पर होने जा रहे हैं। परिसीमन और पुनर्गठन के बाद राज्य के नगरीय निकायों और वार्डों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। वर्ष 2019 में प्रदेश में 196 नगरीय निकाय थे, जिनमें कुल 7475 वार्ड शामिल थे। अब परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर 309 नगरीय निकायों और 10175 वार्डों तक पहुंच गई है। यानी करीब 2700 नए वार्ड बनाए गए हैं। नए नियमों के अनुसार अब किसी भी निकाय में न्यूनतम 20 और अधिकतम 150 वार्ड निर्धारित किए गए हैं।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। स्थानीय निकाय चुनावों को आगामी विधानसभा राजनीति की दिशा तय करने वाला माना जाता है। ऐसे में राज्य सरकार, विपक्ष और विभिन्न राजनीतिक दलों की नजर इस पूरे मामले पर टिकी हुई है। यदि सरकार हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है, तो आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक राजनीतिक तथा कानूनी रूप ले सकता है।
संयम लोढ़ा द्वारा दाखिल की गई कैविएट का कानूनी महत्व भी काफी बड़ा माना जा रहा है। सामान्य तौर पर जब किसी मामले में कैविएट दायर की जाती है, तो अदालत संबंधित पक्ष को सुने बिना कोई अंतरिम या एकतरफा आदेश जारी नहीं करती। इसका मतलब यह है कि यदि राज्य सरकार हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देती है, तो सुप्रीम कोर्ट को पहले संयम लोढ़ा का पक्ष भी सुनना होगा। इससे मामले में पारदर्शिता और सभी पक्षों को सुनने की प्रक्रिया सुनिश्चित होगी।
राजस्थान में लंबे समय से स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। विपक्ष लगातार सरकार पर चुनाव टालने के आरोप लगाता रहा है, जबकि सरकार प्रशासनिक प्रक्रियाओं और परिसीमन को इसकी मुख्य वजह बताती रही है। अब हाईकोर्ट के सख्त रुख और सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुके इस मामले ने राज्य की राजनीति को और गर्मा दिया है।


