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आसाराम को 7 जुलाई तक राहत

आसाराम को 7 जुलाई तक राहत

रेप मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से एक बार फिर राहत मिली है। Rajasthan High Court की जोधपुर मुख्यपीठ ने उनकी मेडिकल आधार पर दी गई अंतरिम जमानत की अवधि को बढ़ाते हुए आगामी 7 जुलाई तक जारी रखने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह राहत 7 जुलाई तक या फिर सजा स्थगन से संबंधित लंबित याचिका पर सुरक्षित रखे गए निर्णय के आने तक प्रभावी रहेगी। दोनों में जो स्थिति पहले बनेगी, उसी के अनुसार अंतरिम जमानत की अवधि समाप्त मानी जाएगी।

यह आदेश ऐसे समय आया है जब आसाराम की पिछली अंतरिम जमानत अवधि समाप्त होने वाली थी। अदालत के समक्ष उनके स्वास्थ्य, बढ़ती उम्र और जारी चिकित्सा उपचार को आधार बनाते हुए राहत बढ़ाने की मांग की गई थी। मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अंतरिम राहत जारी रखने का निर्णय लिया।

सुनवाई में आसाराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए, जबकि अधिवक्ता निशांत बोड़ा और यशपाल सिंह राजपुरोहित व्यक्तिगत रूप से अदालत में मौजूद रहे। बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि 86 वर्षीय आसाराम का चिकित्सा उपचार अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और उन्हें नियमित रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी तथा चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता बनी हुई है। वकीलों ने यह भी तर्क दिया कि स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें जेल भेजना उचित नहीं होगा, विशेष रूप से तब जब उनकी मुख्य अपील पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत का अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है।

बचाव पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि सजा के खिलाफ दायर मुख्य अपील पर सुनवाई अप्रैल में पूरी हो चुकी थी। इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। ऐसे में जब तक अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक अंतरिम जमानत को जारी रखना न्यायहित में होगा। अदालत ने इन तर्कों पर विचार करने के बाद जमानत अवधि बढ़ाने का आदेश पारित किया।

आसाराम पिछले कई वर्षों से अपनी सजा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण वे लगातार राहत की मांग करते रहे हैं। उनके वकीलों का कहना है कि उम्रदराज होने के कारण उन्हें कई प्रकार की चिकित्सकीय परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और नियमित इलाज की आवश्यकता है। इसी आधार पर पहले भी उन्हें अस्थायी राहत मिल चुकी है। समय-समय पर अदालतों ने मेडिकल रिपोर्ट और स्वास्थ्य संबंधी दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की है।

यह मामला वर्ष 2013 में सामने आया था, जब जोधपुर स्थित आश्रम में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा ने आसाराम पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। आरोपों के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और बाद में उन्हें गिरफ्तार किया गया। मामले की सुनवाई विशेष पॉक्सो अदालत में चली, जहां कई वर्षों तक साक्ष्य, गवाहों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर सुनवाई हुई। अंततः अप्रैल 2018 में विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में मामले को गंभीर अपराध मानते हुए कठोर दंड निर्धारित किया था।

सजा के बाद आसाराम ने उच्च अदालतों का रुख किया और फैसले को चुनौती देते हुए विभिन्न कानूनी याचिकाएं दायर कीं। इसी क्रम में उन्होंने सजा स्थगन और जमानत के लिए भी कई बार आवेदन किए। हालांकि शुरुआत में उन्हें राहत नहीं मिली, लेकिन बाद में स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें सीमित अवधि के लिए अंतरिम मेडिकल जमानत प्रदान की गई।

वर्ष 2025 में पहली बार उन्हें चिकित्सा आधार पर राहत मिली थी। इसके बाद जमानत अवधि को लेकर कई कानूनी घटनाक्रम सामने आए। एक समय राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी जमानत बढ़ाने की मांग को अस्वीकार कर दिया था, लेकिन बाद में परिस्थितियों को देखते हुए छह महीने की मेडिकल जमानत प्रदान की गई। इसी दौरान गुजरात में लंबित एक अन्य मामले में भी संबंधित अदालत से उन्हें अस्थायी राहत मिली। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय को मुख्य अपील के शीघ्र निपटारे के निर्देश दिए थे।

वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सजा स्थगन से जुड़ी मुख्य अपील पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत का फैसला सुरक्षित है। अप्रैल 2026 में पहले बचाव पक्ष ने अपनी बहस पूरी की थी, जिसके बाद पीड़िता पक्ष की ओर से भी विस्तृत दलीलें प्रस्तुत की गईं। दोनों पक्षों की सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने आदेश सुरक्षित रख लिया था। अब सभी की नजरें इसी फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह तय करेगा कि सजा स्थगन के संबंध में अदालत का अंतिम रुख क्या रहेगा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिम जमानत बढ़ाने का आदेश मुख्य मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं माना जा सकता। यह केवल स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों और लंबित न्यायिक प्रक्रिया को ध्यान में रखकर दिया गया अस्थायी आदेश है। मुख्य अपील पर आने वाला निर्णय ही आगे की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करेगा।

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