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राजस्थान की तीन हस्तियों को मिला पद्मश्री सम्मान

राजस्थान की तीन हस्तियों को मिला पद्मश्री सम्मान

राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और समाजसेवा की पहचान एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित हुई है। देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री पुरस्कार से इस वर्ष राजस्थान की तीन विशिष्ट हस्तियों को सम्मानित किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने राजस्थान के प्रसिद्ध लोक कलाकार गफरुद्दीन मेवाती जोगी, तगाराम भील और समाजसेवी संत स्वामी ब्रह्मदेव महाराज को पद्मश्री सम्मान प्रदान किया। इन तीनों व्यक्तित्वों ने अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करते हुए राजस्थान की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत को नई पहचान दिलाई है।

राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस समारोह में देशभर की कई प्रमुख हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वर्ष 2026 के पहले चरण में कुल 2 पद्म विभूषण, 6 पद्म भूषण और 58 पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किए गए। समारोह के दौरान राजस्थान की इन तीन हस्तियों को सम्मान मिलने पर पूरे प्रदेश में खुशी और गर्व का माहौल देखने को मिला। लोक कला और समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़े लोगों ने इसे राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर और सेवा भावना का राष्ट्रीय सम्मान बताया।

डीग जिले के कैथवाड़ा गांव में जन्मे गफरुद्दीन मेवाती जोगी लंबे समय से मेवात और ब्रज क्षेत्र की लोक परंपराओं को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। वे भपंग वादन के लिए देशभर में प्रसिद्ध हैं। भपंग राजस्थान का एक पारंपरिक लोक वाद्य है, जिसकी धुनों में लोक जीवन की भावनाएं और संस्कृति झलकती है। गफरुद्दीन मेवाती जोगी ने इस लोक वाद्य को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने वर्षों तक लोक कथाओं और मौखिक परंपराओं को अपनी कला के माध्यम से जीवंत बनाए रखा। महाभारत, लोक रामायण, शिव विवाह और कृष्ण लीला जैसी पारंपरिक कथाओं को उन्होंने लोक संगीत के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाया। उनका योगदान केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने विलुप्त होती लोक वाद्य परंपराओं को संरक्षित करने का भी कार्य किया। बताया जाता है कि उन्होंने लगभग 20 से अधिक पारंपरिक लोक वाद्यों की पहचान और संरक्षण में अहम भूमिका निभाई। यही कारण है कि उन्हें राजस्थान की लोक संस्कृति का जीवंत संरक्षक माना जाता है।

वहीं जैसलमेर जिले के मूलसागर गांव के रहने वाले तगाराम भील ने राजस्थान के पारंपरिक वाद्य अलगोजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलगोजा एक विशेष लोक वाद्य है, जिसे दो बांसुरियों के संयुक्त स्वर से बजाया जाता है। इसकी मधुर धुनें थार मरुस्थल की संस्कृति और जीवनशैली को दर्शाती हैं। तगाराम भील ने बचपन से ही लोक संगीत के प्रति गहरी रुचि दिखाई और अपने पिता से अलगोजा बजाने की कला सीखी।

ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े तगाराम भील पशु चराते समय घंटों अलगोजा का अभ्यास किया करते थे। धीरे-धीरे उनकी कला इतनी निखरती गई कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1981 में स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रस्तुति देने के बाद उन्हें देशभर में पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राजस्थान की लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। उनकी प्रस्तुतियों ने दुनिया भर के संगीत प्रेमियों को थार के संगीत से परिचित कराया। लोक संगीत के क्षेत्र में उनका योगदान आज नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत माना जाता है।

समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले श्रीगंगानगर के स्वामी ब्रह्मदेव महाराज को भी पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। स्वामी ब्रह्मदेव महाराज लंबे समय से दिव्यांग और जरूरतमंद बच्चों के उत्थान के लिए कार्य कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षा, सेवा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के माध्यम से हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया है। समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों के लिए उनके कार्यों को व्यापक सराहना मिली है।

स्वामी ब्रह्मदेव महाराज ने विशेष रूप से दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। उनके प्रयासों से अनेक बच्चों को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और बेहतर जीवन जीने का अवसर मिला। उन्होंने समाजसेवा को केवल दान या सहायता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे मानवता की सेवा का माध्यम बनाया। उनके आश्रम और सामाजिक संस्थानों के जरिए कई जरूरतमंद परिवारों को सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है।

राजस्थान की इन तीन हस्तियों को पद्मश्री सम्मान मिलने को प्रदेश की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपरा के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत साधना और संघर्ष का परिणाम है, बल्कि उन हजारों लोक कलाकारों और समाजसेवियों के लिए भी प्रेरणा है, जो अपनी कला और सेवा के जरिए समाज को नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं।

लोक कला विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के दौर में पारंपरिक लोक कलाओं को संरक्षित रखना बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे समय में गफरुद्दीन मेवाती जोगी और तगाराम भील जैसे कलाकारों ने अपनी साधना और समर्पण से राजस्थान की लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसी तरह स्वामी ब्रह्मदेव महाराज ने यह साबित किया कि समाजसेवा केवल शब्दों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे व्यवहार और कर्म के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना जरूरी है।

राष्ट्रपति भवन में आयोजित पद्म पुरस्कार समारोह के दौरान इन हस्तियों को सम्मानित होते देख राजस्थान के लोगों में गर्व और खुशी का माहौल दिखाई दिया। राज्य के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठनों ने भी इन सभी को बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान पूरे राजस्थान की संस्कृति, परंपरा और सेवा भावना का सम्मान है।

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