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गूगल क्रोम चुपचाप डाउनलोड कर रहा 4GB का AI मॉडल

गूगल क्रोम चुपचाप डाउनलोड कर रहा 4GB का AI मॉडल

दुनियाभर में करोड़ों लोग इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए गूगल क्रोम ब्राउजर का उपयोग करते हैं। स्मार्टफोन, लैपटॉप और कंप्यूटर जैसे लगभग हर डिजिटल डिवाइस में यह सबसे लोकप्रिय वेब ब्राउजरों में शामिल है। लेकिन अब गूगल क्रोम को लेकर एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है, जिसने कई यूजर्स को हैरान कर दिया है। दावा किया जा रहा है कि गूगल क्रोम कुछ यूजर्स के डिवाइस में बिना स्पष्ट अनुमति के करीब 4GB का एक AI मॉडल डाउनलोड कर रहा है। खास बात यह है कि यदि यूजर इस फाइल को डिलीट भी कर देता है, तब भी यह दोबारा अपने-आप डाउनलोड हो जाती है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद स्टोरेज और प्राइवेसी को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

यह खुलासा स्वीडन के कंप्यूटर वैज्ञानिक Alexander Hanff ने अपने ब्लॉग पोस्ट में किया। उन्होंने बताया कि गूगल क्रोम यूजर्स के सिस्टम में “weights.bin” नाम की एक बड़ी फाइल दिखाई दे रही है, जो “OptGuideOnDeviceModel” नाम के फोल्डर के अंदर मौजूद होती है। रिपोर्ट के अनुसार यह फाइल दरअसल गूगल के AI मॉडल Gemini Nano से जुड़ी हुई है। बताया जा रहा है कि यह मॉडल करीब 4GB तक की स्टोरेज घेर सकता है, जिससे कम स्टोरेज वाले डिवाइस इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को परेशानी हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह AI मॉडल हर यूजर के सिस्टम में डाउनलोड नहीं हो रहा, बल्कि यह उन लोगों के डिवाइस में सक्रिय होता है जिन्होंने गूगल क्रोम के कुछ AI फीचर्स ऑन किए हुए हैं। इनमें “Help Me Write” और “On-device Scam Detection” जैसे फीचर्स शामिल बताए जा रहे हैं। गूगल ने हाल के वर्षों में अपने ब्राउजर में कई AI आधारित सुविधाएं जोड़ी हैं, जिनका मकसद यूजर्स को स्मार्ट और सुरक्षित ब्राउजिंग अनुभव देना है। इसी दिशा में Gemini Nano मॉडल को भी ब्राउजर के साथ इंटीग्रेट किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक जब कोई यूजर इन AI फीचर्स को इनेबल करता है, तब क्रोम अपने-आप डिवाइस में Gemini Nano मॉडल डाउनलोड कर लेता है। यह मॉडल लोकल डिवाइस पर ही काम करता है, ताकि कुछ AI फीचर्स बिना इंटरनेट या क्लाउड सर्वर पर डेटा भेजे भी काम कर सकें। हालांकि कई यूजर्स को इस डाउनलोडिंग प्रक्रिया की जानकारी तक नहीं होती, क्योंकि यह बैकग्राउंड में होती रहती है।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह बताई जा रही है कि यदि कोई यूजर इस 4GB फाइल को मैन्युअली डिलीट कर देता है, तो गूगल क्रोम उसे दोबारा डाउनलोड कर लेता है। यही कारण है कि कई लोगों को अचानक अपने सिस्टम की स्टोरेज कम होने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। खासतौर पर वे यूजर्स जिनके लैपटॉप या स्मार्टफोन में सीमित स्टोरेज उपलब्ध है, उनके लिए यह परेशानी बढ़ सकती है।

दरअसल, गूगल ने 2024 में पहली बार क्रोम ब्राउजर में AI फीचर्स को शामिल करना शुरू किया था। शुरुआत में कुछ सीमित AI टूल्स दिए गए थे, लेकिन बाद में कंपनी ने Gemini AI को सीधे ब्राउजर से जोड़ना शुरू कर दिया। इसके बाद Chrome में टेक्स्ट राइटिंग, स्कैम डिटेक्शन और स्मार्ट सुझाव जैसे कई AI फीचर्स शामिल किए गए। कंपनी का दावा है कि ये फीचर्स यूजर एक्सपीरियंस को बेहतर और ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए तैयार किए गए हैं।

हालांकि अब इस AI मॉडल की स्टोरेज खपत को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कई टेक एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसी भी बड़े सॉफ्टवेयर डाउनलोड से पहले यूजर्स को स्पष्ट जानकारी और अनुमति दी जानी चाहिए। खासकर तब जब वह फाइल डिवाइस में कई गीगाबाइट तक की जगह घेर रही हो। कुछ यूजर्स ने सोशल मीडिया और टेक फोरम्स पर शिकायत भी की है कि उन्हें पता ही नहीं था कि उनके सिस्टम में इतना बड़ा AI मॉडल डाउनलोड हो चुका है।

टेक वेबसाइट The Verge की रिपोर्ट के अनुसार, यदि कोई यूजर इस AI मॉडल से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे गूगल क्रोम की सेटिंग्स में जाकर “On-device AI” फीचर को बंद करना होगा। इसके लिए यूजर को Chrome Settings में जाकर System सेक्शन खोलना होगा और वहां मौजूद संबंधित AI ऑप्शन को डिसेबल करना होगा। ऐसा करने के बाद Gemini Nano मॉडल दोबारा डाउनलोड नहीं होगा।

गूगल ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा है कि Gemini Nano को एक हल्के ऑन-डिवाइस AI मॉडल के तौर पर डिजाइन किया गया है। कंपनी के अनुसार इसका उद्देश्य यूजर डेटा को क्लाउड पर भेजे बिना ही कुछ महत्वपूर्ण AI और सुरक्षा फीचर्स उपलब्ध कराना है। कंपनी का कहना है कि यह मॉडल स्कैम डिटेक्शन और डेवलपर APIs जैसी सुविधाओं को बेहतर बनाने में मदद करता है।

इसके अलावा गूगल ने यह भी बताया कि यदि किसी डिवाइस में स्टोरेज की कमी होने लगती है, तो Gemini Nano मॉडल अपने-आप सिस्टम से हट सकता है। हालांकि कई यूजर्स का कहना है कि उन्हें इस प्रक्रिया की जानकारी पहले से नहीं दी गई थी, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई।

टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में AI फीचर्स और ज्यादा आम होने वाले हैं। ऐसे में बड़ी टेक कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि यूजर्स को उनके डिवाइस में होने वाले बदलावों की पूरी जानकारी मिले। AI मॉडल्स का उपयोग जहां एक ओर ब्राउजिंग अनुभव को स्मार्ट और सुरक्षित बना सकता है, वहीं दूसरी ओर स्टोरेज, प्राइवेसी और सिस्टम परफॉर्मेंस जैसे मुद्दे भी सामने आ सकते हैं।

फिलहाल यह मामला टेक जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। कई लोग इसे AI तकनीक की नई दिशा मान रहे हैं, जबकि कुछ यूजर्स इसे बिना अनुमति भारी फाइल डाउनलोड करने का मामला बता रहे हैं। आने वाले समय में गूगल इस फीचर को लेकर और पारदर्शिता लाता है या नहीं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।

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