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रणथंभौर में चीते की दहशत, गांवों में खौफ और खेती पर संकट

रणथंभौर में चीते की दहशत, गांवों में खौफ और खेती पर संकट

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणथंभौर टाइगर रिजर्व इन दिनों एक असामान्य और चिंताजनक स्थिति का सामना कर रहा है। यहां जंगल और आबादी के बीच का संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है, जहां एक साथ बाघ, तेंदुआ और एक भटका हुआ चीता सक्रिय दिखाई दे रहा है। खासतौर पर मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से भटककर आया केपी-2 नाम का चीता पिछले करीब 20 दिनों से इस क्षेत्र में घूम रहा है, जिससे आसपास के गांवों में भय का माहौल गहरा गया है।

वन्यजीवों की मौजूदगी रणथंभौर के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन चीते का इस क्षेत्र में आ जाना स्थानीय लोगों के लिए एक नई और अनपेक्षित चुनौती बन गया है। जानकारी के अनुसार, यह चीता सबसे पहले पालीघाट रेंज के पास देखा गया था और इसके बाद से यह लगातार जोन 8, 9 और 10 के बीच मूवमेंट करता हुआ गांवों के नजदीक तक पहुंच गया है। फिलहाल इसका अधिकतर समय जोन 10 और उससे सटे इलाकों में गुजर रहा है, जिससे ग्रामीणों में असुरक्षा की भावना बढ़ गई है।

चीते की इस सक्रियता का सबसे अधिक असर ग्रामीण जीवन और कृषि कार्यों पर पड़ा है। कैलाशपुरी, दुमोदा और मोजीपुरा जैसे गांवों में रहने वाले लोग अब अपने खेतों और बगीचों तक जाने से डरने लगे हैं। इन क्षेत्रों में अमरूद के बगीचों में चीते की लगातार आवाजाही देखी जा रही है, जिससे किसान अपने नियमित कार्य नहीं कर पा रहे हैं। गर्मी के मौसम में फसलों को नियमित सिंचाई और देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन डर के कारण किसान खेतों में जाने से बच रहे हैं। इसका सीधा असर फसलों पर पड़ रहा है और कई जगहों पर फसलें सूखने लगी हैं।

ग्रामीणों की चिंता केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके परिवार और खासकर बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी बढ़ती जा रही है। चीते द्वारा पालतू पशुओं का शिकार किए जाने की घटनाओं ने इस डर को और गहरा कर दिया है। कई परिवारों ने अपने बच्चों को घर से बाहर निकलने से रोक दिया है, क्योंकि जिन रास्तों से बच्चे स्कूल जाते हैं, उन्हीं इलाकों में चीते की गतिविधियां देखी जा रही हैं। इस स्थिति के कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है और कई बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं।

गांवों में माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया है कि लोग घरों में ही सीमित होकर रह गए हैं। दिन के समय भी लोग समूह में ही बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और रात के समय पूरी तरह से घरों में रहने को मजबूर हैं। इस तरह की स्थिति ने ग्रामीणों की सामान्य दिनचर्या को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है।

वन विभाग की टीमें लगातार चीते की निगरानी कर रही हैं और उसकी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। आधुनिक तकनीकों और ट्रैकिंग सिस्टम की मदद से उसके मूवमेंट को रिकॉर्ड किया जा रहा है, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते टाला जा सके। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि केवल निगरानी पर्याप्त नहीं है। उनका मानना है कि जब तक चीते को सुरक्षित तरीके से पकड़कर किसी उपयुक्त स्थान पर नहीं भेजा जाएगा, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।

ग्रामीणों ने वन विभाग से मांग की है कि जल्द से जल्द प्रभावी कार्रवाई की जाए और चीते को इस क्षेत्र से हटाया जाए। उनका कहना है कि वर्तमान स्थिति में उनका जीवन असुरक्षित हो गया है और वे लगातार डर के साये में जीने को मजबूर हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष का संकेत हैं। जंगलों के सीमित होते दायरे और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में बदलाव के कारण ऐसे जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय लोगों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जाए।

कुल मिलाकर, रणथंभौर क्षेत्र में पैदा हुई यह स्थिति प्रशासन और वन विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। एक ओर वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर ग्रामीणों की सुरक्षा और उनके जीवनयापन की चिंता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस समस्या का समाधान किस तरह किया जाता है और क्या ग्रामीणों को इस डर से राहत मिल पाती है या नहीं।

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