राजस्थान में आमजन को सस्ती दरों पर दैनिक उपयोग की वस्तुएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रस्तावित अन्नपूर्णा भंडार योजना पिछले दो वर्षों से कागजों और बैठकों तक ही सीमित रह गई है। राज्य सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना को दोबारा शुरू करने की घोषणा बड़े स्तर पर की थी, जिसके तहत प्रदेश में लगभग 5 हजार राशन दुकानों को बहुउद्देशीय अन्नपूर्णा भंडार के रूप में विकसित किया जाना था। हालांकि, जमीनी स्तर पर यह योजना अब तक शुरू नहीं हो पाई है, जिससे सरकार की कार्यप्रणाली और योजना क्रियान्वयन पर सवाल उठने लगे हैं।
इस पूरे मुद्दे पर राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री सुमित गोदारा ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार योजना को बेहतर और आधुनिक स्वरूप देने के लिए नवाचार पर काम कर रही है। उन्होंने माना कि वर्तमान समय में बाजार की स्थिति पहले से काफी बदल चुकी है। गांवों और कस्बों में अब निजी स्तर पर बेहतर किराना स्टोर उपलब्ध हैं और युवा व्यापारी नए-नए व्यापार मॉडल के साथ बाजार में उतर रहे हैं। ऐसे में सरकार के लिए यह सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो गया है कि वह इस योजना को किस तरह लागू करे ताकि उपभोक्ताओं को वास्तव में लाभ मिल सके।
मंत्री गोदारा के अनुसार, पहले के समय में जब बाजार में विकल्प सीमित थे, तब सस्ती दरों पर उपलब्ध वस्तुओं की ओर लोगों का झुकाव अधिक था। लेकिन अब उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता बढ़ गई है और वे बेहतर गुणवत्ता तथा विकल्पों की तलाश करते हैं। ऐसे में केवल कम कीमत पर सामान उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुणवत्ता और सुविधा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। यही कारण है कि सरकार योजना के क्रियान्वयन को लेकर सावधानी बरत रही है और इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है।
अन्नपूर्णा भंडार योजना के तहत राशन की दुकानों पर चीनी, चावल, दालें, खाद्य तेल, मसाले, साबुन और अन्य आवश्यक वस्तुएं सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। यह योजना सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल पर आधारित है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों को एक ही स्थान पर किफायती दरों पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराना है। साथ ही, इससे राशन डीलरों की आय बढ़ाने और उन्हें अतिरिक्त व्यापारिक अवसर देने की भी योजना बनाई गई थी।
हालांकि, इस योजना के क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आई हैं। सरकार द्वारा जारी टेंडर प्रक्रिया को लेकर राशन डीलरों ने विरोध जताया। उनका कहना है कि मौजूदा कमीशन दर पहले से ही कम है और नई व्यवस्था से उनके आर्थिक हित प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा, अन्नपूर्णा भंडार के लिए आवेदन शुल्क 2,500 रुपये निर्धारित किया गया था, जिसे कई डीलरों ने अधिक बताया। कई डीलरों ने रजिस्ट्रेशन के लिए राशि जमा भी करवाई, लेकिन योजना शुरू न होने के कारण उनका पैसा फंसा हुआ है, जिससे असंतोष और बढ़ गया है।
योजना के नियम और शर्तें भी एक बड़ी बाधा बनकर सामने आई हैं। सरकार ने निर्देश दिया था कि अन्नपूर्णा भंडार खोलने के लिए राशन डीलर के पास खुद की दुकान होनी चाहिए, जिसका न्यूनतम क्षेत्रफल 200 वर्गफीट हो और वह कम से कम 30 फीट चौड़ी सड़क पर स्थित हो। इन शर्तों को कई डीलरों ने अव्यावहारिक बताया है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी सुविधाएं हर जगह उपलब्ध नहीं हैं।
राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह योजना चर्चा का विषय बनी हुई है। अन्नपूर्णा भंडार योजना की शुरुआत वर्ष 2015 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने की थी। उस समय इसे एक अभिनव पहल के रूप में देखा गया था, लेकिन वर्ष 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस सरकार ने इसे बंद कर दिया। उस समय के खाद्य मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने तर्क दिया था कि इस योजना से आमजन को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा था और इसके प्रबंधन में कई कमियां थीं।
इसके स्थान पर कांग्रेस सरकार ने खाद्य सुरक्षा योजना के तहत मुफ्त राशन किट देने की शुरुआत की, जिसमें खाद्य तेल, मसाले और अन्य आवश्यक वस्तुएं शामिल थीं। हालांकि यह योजना भी सीमित अवधि तक ही चल सकी और चुनाव के बाद बंद हो गई।
अब सत्ता में वापसी के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने इस योजना को पुनर्जीवित करने की घोषणा की थी। बजट 2025-26 में इसे फिर से लागू करने का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन अब तक यह योजना जमीन पर नहीं उतर सकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अन्नपूर्णा भंडार योजना की सफलता के लिए केवल सस्ती कीमतें ही पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि उपभोक्ताओं की बदलती जरूरतों और बाजार की प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए इसे आधुनिक और लचीला बनाना होगा। इसके साथ ही, राशन डीलरों के हितों का भी संतुलन बनाना आवश्यक है, ताकि वे इस योजना में सक्रिय रूप से भाग ले सकें।


