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भारत ने विदेशों से सोना वापस लाना क्यों शुरू किया

भारत ने विदेशों से सोना वापस लाना क्यों शुरू किया

वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत ने अपनी आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाया है। खासकर United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है, जिसका असर भारत पर भी देखने को मिल रहा है। ऐसे हालातों में भारत अब अपने विदेशी भंडार, विशेष रूप से सोने के भंडारण को लेकर अधिक सतर्क हो गया है और तेजी से विदेशों में रखा अपना सोना वापस देश में ला रहा है।

आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि जब भी वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बढ़ती है, तो देश अपने सुरक्षित निवेश विकल्पों को प्राथमिकता देते हैं। सोना लंबे समय से एक सुरक्षित संपत्ति के रूप में देखा जाता रहा है, और यही कारण है कि केंद्रीय बैंक इसे अपने भंडार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए रखते हैं। भारत के मामले में भी यही रणनीति अपनाई जा रही है, लेकिन अब इसमें एक नया पहलू जुड़ गया है—सोने को विदेशों की बजाय देश के भीतर सुरक्षित रखना।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के सोने का एक बड़ा हिस्सा पहले विदेशों में, खासकर ब्रिटेन जैसे देशों के बैंकों में सुरक्षित रखा जाता था। इन संस्थानों में Bank of England और Bank for International Settlements जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं। इन बैंकों में सोना रखने का मुख्य कारण वैश्विक व्यापार में सुविधा और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में लचीलापन था। हालांकि, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में लगाए जा रहे आर्थिक प्रतिबंध, संभावित युद्ध और राजनीतिक अनिश्चितता ने इस व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने को मजबूर कर दिया है।

भारत के केंद्रीय बैंक Reserve Bank of India (RBI) के हालिया आंकड़े इस बदलाव की दिशा को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 के बीच जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास कुल 880.52 मीट्रिक टन सोना है। इसमें से लगभग 77 प्रतिशत यानी करीब 680 टन सोना अब देश के भीतर ही सुरक्षित रखा गया है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि भारत ने अपने भंडार के प्रबंधन में बड़ा बदलाव किया है।

इसके विपरीत, लगभग 197.67 मीट्रिक टन सोना अभी भी विदेशों में रखा हुआ है, जिसमें प्रमुख रूप से बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स शामिल हैं। इसके अलावा 2.8 टन सोना जमा के रूप में रखा गया है। हालांकि, यह अनुपात पहले की तुलना में काफी बदल चुका है। मार्च 2023 तक भारत का केवल 37 प्रतिशत सोना ही देश में मौजूद था, जबकि शेष हिस्सा विदेशों में रखा जाता था। इस तुलना से स्पष्ट होता है कि पिछले कुछ समय में भारत ने अपने सोने के भंडारण की नीति में तेज बदलाव किया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम केवल सुरक्षा कारणों से ही नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यदि भविष्य में किसी प्रकार का वैश्विक संकट उत्पन्न होता है या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तनाव बढ़ता है, तो विदेशों में रखा सोना जोखिम में पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में अपने देश में रखा गया सोना अधिक सुरक्षित माना जाता है और उस पर पूर्ण नियंत्रण भी रहता है।

भारत द्वारा उठाए गए इस कदम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा बनता जा रहा है। दुनिया के कई देश अब अपने विदेशी भंडार को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं और वे भी अपने सोने को वापस अपने देश में लाने पर विचार कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता और आर्थिक जोखिम है, जिसने देशों को अपने संसाधनों की सुरक्षा के लिए नए उपाय अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने केवल छह महीनों के भीतर ही 104.23 मीट्रिक टन सोना वापस देश में मंगाया है। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि सरकार और RBI इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं। इतनी कम अवधि में इतना बड़ा बदलाव यह दर्शाता है कि भारत अब किसी भी प्रकार के बाहरी जोखिम को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है।

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