पश्चिमी राजस्थान में लंबे समय से चली आ रही जल संकट की समस्या के समाधान की दिशा में सोम-कमला-अम्बा परियोजना को एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह परियोजना न केवल क्षेत्र में जल उपलब्धता बढ़ाने का प्रयास है, बल्कि इसके जरिए कृषि, पर्यावरण और भूजल संतुलन को भी मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। राज्य सरकार ने इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए चालू वित्तीय वर्ष में 100 करोड़ रुपए खर्च करने का निर्णय लिया है, जिससे इस महत्वाकांक्षी योजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सके।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य मानसून के दौरान व्यर्थ बह रहे अधिशेष जल को संग्रहित करना और उसे नहरों के माध्यम से सोम-कमला-अम्बा प्रणाली तक पहुंचाना है। इस प्रक्रिया के जरिए जवाई नदी को नित्यवाहिनी बनाने और जवाई बांध के पुनर्भरण की संभावनाओं को मजबूत किया जा सकता है। यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है, तो इससे क्षेत्र में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
इस परियोजना की क्रियान्विति को दीर्घकालिक माना जा रहा है, लेकिन इसके संभावित लाभ इतने व्यापक हैं कि इसे पश्चिमी राजस्थान के लिए गेमचेंजर के रूप में देखा जा रहा है। खासतौर पर पाली और जालोर जिलों के किसानों को इससे सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा बांसवाड़ा, सलूम्बर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर और उदयपुर जैसे जिलों को भी इस योजना से लाभान्वित किया जा सकता है।
इस दिशा में राज्य सरकार की सक्रियता भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पाली जिले के रोहट में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की घोषणा की थी। इनमें राम जल सेतु लिंक परियोजना, देवास परियोजना, यमुना जल समझौता और सोम-कमला-अम्बा परियोजना की डीपीआर तैयार कराने का निर्णय शामिल है। इन घोषणाओं के बाद क्षेत्र के लोगों, विशेषकर किसानों में नई उम्मीद जगी है कि उनकी वर्षों पुरानी जल समस्या का समाधान निकट भविष्य में संभव हो सकेगा।
इस परियोजना की आवश्यकता और महत्व को समझने के लिए इसके तकनीकी पहलुओं पर नजर डालना भी जरूरी है। प्रस्तावित योजना के तहत मानसून के दौरान अनास नदी में बहने वाले अतिरिक्त जल को कृत्रिम जलाशयों के माध्यम से संग्रहित किया जाएगा। इसके बाद इस जल को फीडर नहरों के जरिए सोम-कमला-अम्बा प्रणाली तक पहुंचाया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया के लिए करीब 5 हजार 900 करोड़ रुपए की लागत से परियोजना प्रस्तावित की गई है।
परियोजना के अंतर्गत गुजरात सीमा से पहले साबरमती प्रथम और सेई नदी पर बांध निर्माण की योजना भी शामिल है। इन बांधों की कुल क्षमता लगभग 6 हजार एमसीएफटी बताई जा रही है, जहां मानसून के दौरान पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध रहता है। इसके अलावा जोगीवर क्षेत्र में लघु सिंचाई परियोजना प्रस्तावित है, जहां से पानी को आगे की दिशा में प्रवाहित किया जा सकेगा।
तकनीकी रूप से इस परियोजना में टनल निर्माण भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। योजना के अनुसार साबरमती प्रथम से लुंदाड़ा क्षेत्र तक लगभग 40 किलोमीटर लंबी टनल बनाई जाएगी, जबकि जोगीवर से साबरमती तक करीब 8 किलोमीटर की टनल का निर्माण प्रस्तावित है। इस तरह कुल मिलाकर लगभग 50 किलोमीटर लंबी टनल के जरिए जल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की योजना है। यदि यह टनल सफलतापूर्वक बन जाती है, तो भविष्य में मानसी और वंकल जैसी अन्य जल स्रोतों का पानी भी जालोर और सिरोही क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकेगा।
इस परियोजना का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके जरिए जवाई बांध की तुलना में लगभग चार गुना अधिक पानी उपलब्ध कराया जा सकता है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार कोटड़ा तहसील में गुजरात सीमा के पास बनने वाले बांधों में पानी की भरपूर आवक बनी रहेगी, जिससे इस योजना की उपयोगिता और भी बढ़ जाती है।
इस परियोजना को लेकर जल संसाधन विभाग और किसानों के बीच भी संवाद स्थापित किया गया है। भारतीय किसान संघ के प्रतिनिधियों ने इस योजना में जालोर जिले को शामिल करने की मांग उठाई थी, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है। इससे किसानों में संतोष का माहौल है और उन्हें उम्मीद है कि यह परियोजना उनके लिए वास्तविक लाभ लेकर आएगी।
जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का भी मानना है कि यह परियोजना भविष्य को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। यदि इसे सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो यह न केवल वर्तमान जल संकट का समाधान करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जल संसाधनों को सुरक्षित करने में मददगार साबित होगी।


