अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के मौके पर राजस्थान की राजनीति में श्रमिकों के अधिकारों और उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर बहस तेज हो गई है। इस अवसर पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने श्रमिकों को शुभकामनाएं देने के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों के सामने कई अहम मांगें रखीं। उन्होंने अपने संदेश के जरिए यह स्पष्ट किया कि केवल श्रमिकों का सम्मान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी आर्थिक सुरक्षा और जीवन स्तर में सुधार के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है।
गहलोत ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचार साझा करते हुए कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल में श्रमिकों को राहत देने के उद्देश्य से कई योजनाएं शुरू की गई थीं। उन्होंने विशेष रूप से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, यानी मनरेगा की तर्ज पर लागू की गई ‘शहरी रोजगार गारंटी योजना’ का उल्लेख किया, जिसे उन्होंने श्रमिकों के लिए एक मजबूत सहारा बताया। उनके अनुसार यह योजना शहरी क्षेत्रों में रहने वाले मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने और उनकी आय को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण साबित हुई थी।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने बयान में राहुल गांधी की ‘न्याय’ योजना पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में श्रमिकों की वास्तविक आय में वृद्धि के लिए इस योजना को लागू करना बेहद आवश्यक हो गया है। उनका मानना है कि ‘न्याय’ योजना के जरिए समाज के कमजोर वर्गों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जा सकती है, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आएगा। गहलोत ने यह भी कहा कि श्रम ही राष्ट्र की असली शक्ति है और देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में श्रमिकों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है।
इससे पहले गहलोत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को एक विस्तृत पत्र लिखकर प्रदेश के श्रमिकों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने पत्र में आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि मार्च 2026 तक राजस्थान न्यूनतम मजदूरी के मामले में देश के पिछड़े राज्यों में गिना जा रहा है। वर्तमान में राज्य में अकुशल श्रमिकों को लगभग 7,410 रुपये प्रतिमाह मजदूरी मिल रही है, जो बढ़ती महंगाई के बीच बेहद अपर्याप्त है। गहलोत ने इसे श्रमिकों के साथ अन्याय बताते हुए कहा कि इस आय से उनका गुजारा करना बेहद कठिन हो गया है।
गहलोत ने अपने पत्र में अन्य राज्यों के उदाहरण देते हुए बताया कि केरल और दिल्ली जैसे राज्यों में श्रमिकों की मजदूरी में 80 से 110 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है, जबकि राजस्थान में यह वृद्धि बहुत सीमित रही है। उन्होंने इस अंतर को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए राज्य सरकार से तत्काल प्रभाव से सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की। उनके अनुसार यदि श्रमिकों की आय में पर्याप्त वृद्धि नहीं की गई तो इससे न केवल उनके जीवन स्तर पर असर पड़ेगा, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने श्रमिकों की स्थिति सुधारने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाकर 12,000 से 15,000 रुपये प्रतिमाह किया जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिल सके। इसके अलावा उन्होंने महंगाई भत्ते, यानी वेरिएबल डियरनेस अलाउंस (VDA), को हर छह महीने में स्वतः लागू करने की व्यवस्था करने की भी मांग की। उनका कहना है कि महंगाई के लगातार बढ़ते स्तर को देखते हुए यह कदम बेहद जरूरी है।
गहलोत ने यह भी सुझाव दिया कि अलग-अलग क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए अलग-अलग मजदूरी दरें तय की जानी चाहिए। कृषि, निर्माण और घरेलू कार्य जैसे क्षेत्रों की प्रकृति अलग होती है, इसलिए इनके लिए एक समान मजदूरी दर तय करना व्यावहारिक नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मजदूरी की गणना करते समय परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे आवश्यक खर्चों को भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों को वास्तविक राहत मिल सके।
इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्थान की राजनीति में श्रमिकों के मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। जहां एक ओर सरकारें विकास और रोजगार के दावे कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर श्रमिकों की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। श्रमिक दिवस के अवसर पर उठी यह बहस आने वाले समय में नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकती है।


