देश में हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों के लिए आने वाला समय थोड़ा महंगा साबित हो सकता है। बीमा क्षेत्र से जुड़ी ताजा जानकारियों के अनुसार अगले 12 से 18 महीनों के दौरान हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम में लगभग 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। यह बदलाव एक साथ लागू होने की संभावना कम है, बल्कि बीमा कंपनियां इसे चरणबद्ध तरीके से पॉलिसी रिन्यूअल के समय लागू कर सकती हैं, ताकि ग्राहकों पर अचानक वित्तीय बोझ न पड़े।
स्वास्थ्य बीमा आज के समय में हर परिवार की जरूरत बन चुका है। बढ़ते इलाज खर्च, निजी अस्पतालों की फीस और गंभीर बीमारियों के इलाज पर लाखों रुपये तक खर्च होने के कारण लोग हेल्थ इंश्योरेंस को सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं। ऐसे में यदि प्रीमियम दरों में बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर करोड़ों पॉलिसीधारकों पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार यह बढ़ोतरी सभी ग्राहकों पर समान रूप से लागू नहीं होगी। प्रीमियम तय करने में उम्र, शहर, बीमा कवर राशि, क्लेम हिस्ट्री और स्वास्थ्य जोखिम जैसे कई फैक्टर्स की भूमिका रहेगी। बड़े शहरों में रहने वाले लोगों, वरिष्ठ नागरिकों और पहले से मेडिकल क्लेम लेने वाले ग्राहकों को ज्यादा प्रीमियम देना पड़ सकता है। वहीं युवा और कम जोखिम वाले ग्राहकों पर इसका असर अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
बीमा विशेषज्ञों का मानना है कि हेल्थ इंश्योरेंस महंगा होने के पीछे सबसे बड़ी वजह मेडिकल खर्चों में लगातार हो रही तेज वृद्धि है। देश में हेल्थकेयर लागत हर साल लगभग 14 से 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जो सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक है। अस्पतालों की सेवाएं, सर्जरी, दवाइयां, डायग्नोस्टिक टेस्ट और डॉक्टर फीस पहले की तुलना में काफी महंगे हो चुके हैं।
दूसरा बड़ा कारण बीमा कंपनियों पर बढ़ता क्लेम बोझ है। कोविड महामारी के बाद स्वास्थ्य बीमा दावों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। कई लोगों ने अस्पताल में भर्ती, ICU इलाज और गंभीर बीमारियों के लिए पॉलिसी का उपयोग किया। इसके अलावा अब लोग पहले से ज्यादा जागरूक होकर हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम कर रहे हैं। इससे कंपनियों की लागत बढ़ी है और वे अपने नुकसान की भरपाई के लिए प्रीमियम बढ़ा सकती हैं।
अस्पतालों द्वारा पैकेज दरों में बढ़ोतरी भी इस स्थिति का एक कारण है। बड़े निजी अस्पतालों में इलाज खर्च तेजी से बढ़ा है। कई शहरों में सामान्य सर्जरी और भर्ती खर्च भी पहले की तुलना में दोगुना तक हो चुका है। बीमा कंपनियां जब अस्पतालों को अधिक भुगतान करती हैं, तो उसका प्रभाव अंततः पॉलिसीधारकों के प्रीमियम पर दिखाई देता है।
यदि पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों को देखें तो हेल्थ इंश्योरेंस पहले भी महंगा हुआ है। वित्तीय वर्ष 2023 से 2025 के बीच व्यक्तिगत हेल्थ पॉलिसी प्रीमियम में लगभग 23 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं फैमिली फ्लोटर योजनाओं में भी बड़ा उछाल देखा गया। वर्ष 2021 में जो पॉलिसी लगभग 15 हजार रुपये सालाना मिलती थी, वह 2025 तक करीब 22 हजार रुपये तक पहुंच गई। यानी कुछ योजनाओं में लगभग 46 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई।
इससे साफ है कि हेल्थ इंश्योरेंस क्षेत्र में लागत बढ़ने का दबाव पहले से मौजूद है और आने वाले महीनों में यह और तेज हो सकता है। हालांकि कंपनियां इसे धीरे-धीरे लागू करेंगी, जिससे ग्राहक एक बार में ज्यादा झटका महसूस न करें।
ग्राहकों के लिए इस समय सबसे जरूरी बात यह है कि अपनी पॉलिसी समय पर रिन्यू करते रहें। यदि पॉलिसी लैप्स हो जाती है, तो कई बार वेटिंग पीरियड दोबारा लागू हो सकता है या प्रीमियम अधिक देना पड़ सकता है। लगातार पॉलिसी चालू रखने से नो क्लेम बोनस, निरंतर कवरेज और पुरानी शर्तों का लाभ भी मिलता है।
पर्याप्त बीमा कवर चुनना भी बेहद जरूरी है। कई लोग कम प्रीमियम बचाने के लिए कम कवर वाली पॉलिसी ले लेते हैं, लेकिन मेडिकल इमरजेंसी के समय वही कवर अपर्याप्त साबित होता है। बड़े शहरों में इलाज खर्च को देखते हुए पर्याप्त सम इंश्योर्ड चुनना समझदारी हो सकती है।
सीनियर सिटीजन के लिए यह बदलाव अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य जोखिम भी बढ़ते हैं और बीमा प्रीमियम सामान्यतः ज्यादा होता है। ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों को अपने कवर की समीक्षा समय रहते करनी चाहिए।
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि अलग-अलग कंपनियों की योजनाओं की तुलना करें। कई बार समान कवर अलग प्रीमियम पर उपलब्ध होता है। कैशलेस नेटवर्क, क्लेम सेटलमेंट रिकॉर्ड, रूम रेंट लिमिट, को-पेमेंट और वेटिंग पीरियड जैसी शर्तों को समझकर पॉलिसी चुनना बेहतर रहता है।


