राजस्थान में सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम सामने आया है। मेडिकल असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती 2021 की चयन प्रक्रिया पर राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए इंटरव्यू शुरू होने से ठीक पहले रोक लगा दी। यह आदेश उस समय जारी हुआ जब राजस्थान लोक सेवा आयोग ने इंटरव्यू की सभी तैयारियां पूरी कर ली थीं और कई अभ्यर्थी निर्धारित केंद्रों पर पहुंच चुके थे। अदालत के इस निर्णय ने भर्ती प्रक्रिया, पारदर्शिता और चयन मानकों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब 13 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित इंटरव्यू से लगभग एक घंटे पहले हाईकोर्ट की एकलपीठ ने भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाने के आदेश जारी किए। न्यायालय ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कहा कि यदि मौजूदा स्थिति में प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है तो अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसी आधार पर अदालत ने अगली सुनवाई तक पूरी चयन प्रक्रिया पर रोक लगा दी।
यह आदेश डॉ. अमित कुमार शर्मा और अन्य अभ्यर्थियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया और कहा कि चयन प्रणाली निष्पक्ष तथा पारदर्शी नहीं है। अदालत ने याचिका में उठाए गए बिंदुओं को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार और राजस्थान लोक सेवा आयोग से जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ताओं का प्रमुख आरोप यह था कि भर्ती विज्ञापन में लिखित परीक्षा का प्रावधान दर्शाया गया था, लेकिन बाद में लिखित परीक्षा आयोजित ही नहीं की गई। इसके बजाय चयन प्रक्रिया को पूरी तरह इंटरव्यू आधारित बना दिया गया। अभ्यर्थियों का कहना है कि केवल साक्षात्कार के आधार पर चयन करना निष्पक्षता के सिद्धांतों के विपरीत है, क्योंकि इसमें व्यक्तिपरकता की संभावना अधिक रहती है।
याचिका में यह भी कहा गया कि इंटरव्यू के लिए अंक देने का कोई स्पष्ट, सार्वजनिक और वस्तुनिष्ठ मानक जारी नहीं किया गया। इससे उम्मीदवारों को यह जानकारी ही नहीं थी कि किस आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा। अभ्यर्थियों का तर्क है कि सरकारी भर्ती में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और चयन के हर चरण का मानक पहले से स्पष्ट होना चाहिए।
कोर्ट में यह मुद्दा भी उठाया गया कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में कई मामलों में यह सिद्धांत स्पष्ट कर चुका है कि इंटरव्यू के अंक कुल अंकों के सीमित प्रतिशत तक होने चाहिए, ताकि अंतिम चयन केवल मौखिक परीक्षा पर निर्भर न हो जाए। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस भर्ती प्रक्रिया में उस सिद्धांत का पालन नहीं किया गया। यदि ऐसा है तो चयन प्रक्रिया संतुलित नहीं मानी जा सकती।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दीपेंद्र यादव ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया में बदलाव से उम्मीदवारों के वैध अधिकार प्रभावित हुए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अभ्यर्थियों ने विज्ञापन की शर्तों के आधार पर तैयारी की थी। यदि बाद में चयन प्रणाली बदली जाती है या स्पष्टता नहीं रखी जाती, तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए यह भी निर्देश दिया कि पहले से चयनित अभ्यर्थियों और मेरिट सूची में शामिल उम्मीदवारों को भी पक्षकार बनाया जाए। अदालत का मानना है कि अंतिम निर्णय का प्रभाव इन उम्मीदवारों पर भी पड़ सकता है, इसलिए सभी संबंधित पक्षों को सुनना आवश्यक है। यह कदम न्यायिक संतुलन और निष्पक्ष सुनवाई की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अदालत ने राज्य सरकार और राजस्थान लोक सेवा आयोग को स्पष्ट निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई तक भर्ती प्रक्रिया को आगे न बढ़ाया जाए। इसका अर्थ है कि इंटरव्यू, परिणाम या नियुक्ति से जुड़े किसी भी अगले चरण पर फिलहाल रोक रहेगी। इससे उन अभ्यर्थियों में अनिश्चितता बढ़ गई है जो लंबे समय से इस भर्ती प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे।
मेडिकल असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती राज्य के चिकित्सा शिक्षा ढांचे के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। मेडिकल कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों में विशेषज्ञ फैकल्टी की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया रुकने से संस्थानों में रिक्त पदों की समस्या कुछ समय और बनी रह सकती है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि नियुक्तियों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और टिकाऊ हो, ताकि बाद में विवाद न पैदा हों।
इस घटनाक्रम ने राजस्थान में सरकारी भर्तियों की प्रक्रियाओं पर भी सवाल खड़े किए हैं। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और चयन विवादों को लेकर राज्य में चर्चा होती रही है। ऐसे माहौल में अदालत का यह आदेश प्रशासनिक संस्थाओं के लिए एक संदेश माना जा रहा है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, पूर्व निर्धारित नियम और समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है।
अभ्यर्थियों के बीच इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ उम्मीदवार इसे न्यायसंगत कदम मान रहे हैं, क्योंकि इससे निष्पक्ष चयन की उम्मीद बढ़ी है। वहीं कई उम्मीदवारों का कहना है कि लंबे समय से भर्ती का इंतजार कर रहे युवाओं के लिए यह देरी निराशाजनक है। अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि भर्ती प्रक्रिया दोबारा शुरू होगी, संशोधित होगी या किसी नए प्रारूप में आयोजित की जाएगी।


