अजमेर में करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित अजमेर विकास प्राधिकरण (ADA) की नई मल्टीस्टोरी बिल्डिंग अब विवादों के केंद्र में आ गई है। भवन निर्माण को लेकर यह आरोप लगाया गया है कि निर्माण के दौरान नाले के अनिवार्य बफर जोन की अनदेखी की गई। मामले ने तूल तब पकड़ा जब नगरीय विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव आलोक गुप्ता अजमेर दौरे पर पहुंचे और उनसे इस विषय में सवाल किया गया। उन्होंने कहा कि यदि नाले के बफर क्षेत्र की अनदेखी कर निर्माण किया गया है तो यह जांच का विषय है और इसकी तथ्यात्मक समीक्षा की जाएगी। शहर में इस भवन को आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा था, लेकिन अब इसके निर्माण स्थल और भू-उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिस भूमि पर भवन बनाया गया है, वह राजस्व अभिलेखों में “गैर मुमकिन नाला” के रूप में दर्ज है। यदि ऐसा है तो वहां स्थायी निर्माण की अनुमति कैसे दी गई, यह जांच का विषय बन चुका है।
अतिरिक्त मुख्य सचिव आलोक गुप्ता शुक्रवार को अजमेर पहुंचे थे। इस दौरान मीडिया और स्थानीय लोगों ने उनसे नई मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के निर्माण में नाले की अनदेखी तथा आसपास हो रहे अतिक्रमण के बारे में सवाल पूछे। इस पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि ऐसी स्थिति है तो इसकी जांच कराई जाएगी। उनके बयान के बाद मामले को प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि इस दौरान एडीए कमिश्नर आईएएस के. नित्या से भी जानकारी ली गई। उन्होंने कहा कि भवन नाले पर नहीं बनाया गया है और निर्माण के दौरान नौ मीटर का बफर जोन छोड़ा गया है। प्रशासन की ओर से यह दावा किया गया कि नियमों के अनुरूप निर्माण कार्य हुआ है और किसी प्रकार का उल्लंघन नहीं किया गया।
हालांकि इस दावे पर शिकायतकर्ता अशोक मलिक ने कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अतिरिक्त मुख्य सचिव को वास्तविक स्थिति से अवगत कराने के बजाय गलत जानकारी दी गई, जिससे उन्हें गुमराह किया गया। शिकायतकर्ता ने इस संबंध में विस्तृत पत्र भेजकर पूरे मामले की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि रिकॉर्ड, नक्शे, स्वीकृतियां और स्थल निरीक्षण रिपोर्ट सामने आने पर सच्चाई स्पष्ट हो जाएगी। अशोक मलिक ने अपने पत्र में कहा कि संबंधित भूमि खसरा संख्या 576 में आती है, जिसे राजस्व रिकॉर्ड में नाले की श्रेणी में दर्ज बताया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किस अधिकार, किस अनुमति और किस प्रक्रिया के तहत वहां स्थायी निर्माण की स्वीकृति दी गई। उन्होंने मांग की है कि एडीए से जुड़ी सभी फाइल नोटिंग्स, स्वीकृति दस्तावेज, नक्शे और निरीक्षण प्रतिवेदन तलब किए जाएं, ताकि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो सके।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि केवल सरकारी भवन निर्माण ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्र में अतिक्रमणकारियों ने भी नाले को नुकसान पहुंचाकर कब्जे कर लिए हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले बरसाती मौसम में जलभराव, निकासी अवरोध और स्थानीय नागरिकों की परेशानियां बढ़ सकती हैं। शहरों में प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण लंबे समय से बड़ी समस्या रहे हैं और यह मामला भी उसी चिंता से जुड़ा माना जा रहा है।
पत्र में यह मांग भी की गई है कि नाले को उसके मूल राजस्व अभिलेखीय मार्ग और वास्तविक स्थिति में पुनर्स्थापित किया जाए। हालांकि शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि सरकारी धन का अनावश्यक नुकसान नहीं होना चाहिए। इसलिए यदि भवन का कोई हिस्सा नाले के मूल प्रवाह क्षेत्र या बफर जोन में आता है, तो केवल उसी हिस्से को हटाया जाए। इससे कानून का पालन भी होगा और सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ेगा।
मामले में जवाबदेही तय करने की मांग भी उठाई गई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि जांच में यह सामने आता है कि संबंधित अधिकारियों की लापरवाही या कर्तव्य की उपेक्षा के कारण नाले की भूमि पर निर्माण हुआ, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगेगी और प्रशासनिक पारदर्शिता मजबूत होगी।
पत्र में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि किसी विशेष आदेश, अधिसूचना, कानून या सरकारी छूट के तहत ऐसे निर्माण को नियमित या अनुमन्य बनाया गया है, तो उसका स्पष्ट कानूनी आधार सार्वजनिक किया जाए। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि सरकार किसी संस्थान को राहत देती है, तो आम नागरिकों के लिए भी समान नियम होने चाहिए। कानून का दोहरा मापदंड स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
इस पूरे मामले में एडीए कमिश्नर के. नित्या से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। वहीं शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि अतिक्रमणकारियों के खिलाफ जानबूझकर कार्रवाई नहीं की जा रही है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल निर्माण विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता का मामला भी बन सकता है।
अजमेर जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में शहरी नियोजन, जल निकासी और पर्यावरणीय संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं। यदि नालों, जलमार्गों और बफर जोन की अनदेखी कर निर्माण किए जाते हैं, तो भविष्य में बाढ़, जलभराव और बुनियादी ढांचे पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए यह मामला केवल एक भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर नियोजन और कानून के समान अनुपालन से जुड़ा हुआ है।
अब सबकी नजर राज्य सरकार और नगरीय विकास विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी है। यदि जांच होती है तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण नियमों के अनुसार हुआ या नहीं। साथ ही यह भी तय होगा कि अजमेर में शहरी विकास के नाम पर पर्यावरणीय और राजस्व नियमों की कितनी गंभीरता से पालना की जा रही है।


