राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के सौर ऊर्जा निवेशकों को बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसे उद्योग जगत के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार अपनी घोषित नीतियों और निवेशकों से किए गए वादों से मनमाने तरीके से पीछे नहीं हट सकती। न्यायालय ने कहा कि यदि सरकार किसी नीति के आधार पर निवेश आकर्षित करती है और उद्योग उसी भरोसे पर करोड़ों रुपए लगाते हैं, तो बाद में पूर्व प्रभाव से लाभ वापस लेना उचित नहीं माना जा सकता।
यह फैसला उन कैप्टिव और रूफटॉप सोलर पावर प्लांट्स के लिए बेहद अहम है, जो 10 मई 2022 से पहले स्थापित हो चुके थे। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आदेश दिया है कि ऐसे सभी पात्र प्लांट्स को उनकी स्थापना या संचालन शुरू होने की तारीख से सात वर्षों तक बिजली शुल्क में पूर्ण छूट का लाभ दिया जाएगा। इससे प्रदेश के अनेक उद्योगों को करोड़ों रुपए की राहत मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
यह मामला तब शुरू हुआ जब राजस्थान सरकार ने अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राजस्थान सौर ऊर्जा नीति 2019 लागू की थी। इस नीति के तहत उद्योगों और निवेशकों को सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए प्रोत्साहन दिया गया था। नीति के एक महत्वपूर्ण प्रावधान में यह वादा किया गया था कि कैप्टिव सोलर प्लांट लगाने वाले उद्योगों को सात साल तक बिजली शुल्क से छूट मिलेगी। इस आश्वासन के आधार पर प्रदेश के कई बड़े उद्योगों ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश किया और अपने संयंत्र स्थापित किए।
कैप्टिव सोलर प्लांट वे संयंत्र होते हैं, जिन्हें उद्योग अपनी खुद की बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए लगाते हैं। इससे उद्योगों को बिजली लागत कम करने, ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाने और पर्यावरण हितैषी विकल्प अपनाने में मदद मिलती है। राजस्थान जैसे धूप वाले राज्य में सौर ऊर्जा निवेश की बड़ी संभावनाएं हैं, इसलिए कई कंपनियों ने इसे दीर्घकालिक समाधान के रूप में अपनाया।
हालांकि 10 मई 2022 को सरकार ने नीति में संशोधन करते हुए पहले दी गई छूट वापस ले ली। इसके बाद बिजली शुल्क दोबारा लागू कर दिया गया और वितरण कंपनियों की ओर से उद्योगों को भारी-भरकम बिल भेजे जाने लगे। इससे निवेशकों और उद्योगों में असंतोष फैल गया। उनका कहना था कि उन्होंने सरकार की नीति पर भरोसा कर निवेश किया था, इसलिए बाद में नियम बदलकर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना अनुचित है।
इसी विवाद को लेकर भीलवाड़ा की मेवाड़ चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री तथा विभिन्न सोलर एसोसिएशनों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने की। अदालत ने याचिकाओं का निपटारा करते हुए निवेशकों के पक्ष में फैसला सुनाया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सरकार को जनहित, आर्थिक परिस्थितियों या प्रशासनिक कारणों से नीतियों में बदलाव करने का अधिकार है, लेकिन वह पहले से अर्जित अधिकारों को पूर्वव्यापी प्रभाव से समाप्त नहीं कर सकती। यदि किसी नीति के भरोसे निवेशक धन लगाते हैं और दीर्घकालिक योजनाएं बनाते हैं, तो सरकार बाद में वादा तोड़कर उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकती।
अदालत की टिप्पणी निवेशक विश्वास के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। न्यायालय ने कहा कि यदि सरकारें बार-बार अपने वादों से पीछे हटेंगी, तो उद्योगों और निवेशकों का भरोसा सरकारी नीतियों से उठ जाएगा। इससे भविष्य के निवेश प्रभावित होंगे और औद्योगिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर राजस्थान के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों पर पड़ेगा। विशेष रूप से टेक्सटाइल, माइनिंग, सीमेंट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने ऊर्जा लागत कम करने के लिए बड़े पैमाने पर कैप्टिव सोलर प्लांट लगाए थे। भीलवाड़ा जैसे औद्योगिक शहर, जो टेक्सटाइल उद्योग के लिए प्रसिद्ध हैं, वहां इस निर्णय से व्यापक राहत मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा लागत किसी भी उद्योग के संचालन में अहम भूमिका निभाती है। यदि बिजली शुल्क में राहत मिलती है, तो उत्पादन लागत कम होती है, प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और रोजगार सृजन को भी बल मिलता है। ऐसे में यह फैसला केवल कानूनी जीत नहीं, बल्कि आर्थिक राहत का भी माध्यम है।
मेवाड़ चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के महासचिव आरके जैन ने इस निर्णय को उद्योगों के लिए ऐतिहासिक बताया है। उनका कहना है कि टेक्सटाइल सहित अन्य उद्योगों ने सरकार की नीति पर भरोसा करके ग्रीन एनर्जी में करोड़ों रुपए लगाए थे। लेकिन बीच में छूट वापस लेने से उद्योगों पर भारी आर्थिक दबाव आ गया था। अब हाईकोर्ट के फैसले से उन्हें बड़ी राहत मिलेगी और भविष्य के निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा।
यह निर्णय राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए भी सकारात्मक संकेत है। राज्य पहले से सौर ऊर्जा क्षमता के मामले में अग्रणी माना जाता है। यदि नीतिगत स्थिरता बनी रहती है, तो घरेलू और विदेशी निवेशक इस क्षेत्र में और अधिक निवेश करने के लिए प्रेरित होंगे।
फिलहाल अदालत ने पात्र उद्योगों और सदस्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर छूट का लाभ लेने की अनुमति दी है। आने वाले समय में इस फैसले के बाद कई उद्योग राहत के लिए आवेदन कर सकते हैं। कुल मिलाकर राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल सोलर निवेशकों के लिए राहत भरा है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि नीति आधारित निवेशों की सुरक्षा न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।


