केंद्र सरकार ने देश की चुनावी व्यवस्था में बड़े बदलाव की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए लोकसभा में डीलिमिटेशन बिल पेश कर दिया है। इस विधेयक को कानून और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में प्रस्तुत किया और इसके साथ ही इस पर बहस की शुरुआत भी हो गई। इस बिल को भारतीय लोकतंत्र के ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इसके लागू होने से लोकसभा और राज्यों की विधानसभा सीटों की संख्या में व्यापक वृद्धि होने की संभावना है।
विधेयक के अनुसार, परिसीमन की इस नई प्रक्रिया के बाद देशभर में लोकसभा सीटों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। मौजूदा स्थिति में जहां लोकसभा में 543 सीटें हैं, वहीं प्रस्तावित बदलाव के बाद यह संख्या बढ़कर लगभग 815 तक पहुंच सकती है। इस बढ़ोतरी के साथ ही महिलाओं के लिए भी बड़ा प्रावधान किया गया है। प्रस्ताव के तहत कुल सीटों में से 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात कही गई है। यह कदम महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बिल पेश करते हुए स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण लागू होने से न तो पुरुषों के अधिकारों पर कोई असर पड़ेगा और न ही किसी राज्य के साथ अन्याय होगा। उन्होंने यह भी बताया कि इस आरक्षण के भीतर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की महिलाओं के लिए भी अलग से प्रावधान किया जाएगा, जिससे सामाजिक न्याय को और मजबूती मिलेगी।
डीलिमिटेशन, जिसे हिंदी में परिसीमन कहा जाता है, एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा तय किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में जनसंख्या का संतुलन बना रहे और प्रत्येक वोट की अहमियत समान हो। भारत में आखिरी बार व्यापक स्तर पर परिसीमन की प्रक्रिया वर्ष 2002 में पूरी की गई थी, जो 2001 की जनगणना के आधार पर की गई थी। इसके बाद से इस प्रक्रिया पर रोक लगी हुई थी, जिससे समय के साथ जनसंख्या में हुए बदलाव का असर चुनावी क्षेत्रों में नहीं दिख पा रहा था।
अब केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत इस नए बिल का उद्देश्य न केवल लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना है, बल्कि उनकी सीमाओं को भी नए सिरे से निर्धारित करना है। हालांकि इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद भी सामने आ रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि परिसीमन की प्रक्रिया 2011 की जनगणना के बजाय ताजा जनगणना के आंकड़ों के आधार पर की जानी चाहिए, ताकि वर्तमान जनसंख्या की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखा जा सके।
इस प्रस्तावित बदलाव का असर राजस्थान जैसे बड़े राज्यों पर भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा। वर्तमान में राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटें हैं, लेकिन परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर लगभग 38 तक पहुंच सकती है। यानी राज्य में करीब 13 नई सीटों का इजाफा होगा। यह बदलाव राज्य की राजनीतिक संरचना और प्रतिनिधित्व में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
अगर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत में पहला आम चुनाव 1951 में हुआ था, उस समय राजस्थान में लोकसभा सीटों की संख्या 18 थी। बाद में वर्ष 1973 में परिसीमन आयोग की सिफारिशों के आधार पर यह संख्या बढ़ाकर 25 कर दी गई थी। अब एक बार फिर परिसीमन की प्रक्रिया के चलते सीटों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
केवल लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्य की विधानसभा सीटों पर भी इसका असर पड़ेगा। अनुमान है कि परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राजस्थान में विधानसभा सीटों की संख्या 200 से बढ़कर लगभग 270 तक पहुंच सकती है। यानी करीब 70 सीटों का इजाफा संभव है। इससे प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं और प्रतिनिधित्व का दायरा भी बढ़ेगा।
इस संदर्भ में राजस्थान विधानसभा के स्पीकर वासुदेव देवनानी ने भी हाल ही में जानकारी दी थी कि भविष्य में सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना को देखते हुए नए विधानसभा भवन के निर्माण की योजना बनाई जा रही है। उन्होंने बताया कि नए सदन को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि उसमें करीब 280 सदस्य बैठ सकें। इसके लिए बजट भी स्वीकृत किया जा चुका है और आने वाले समय में इस दिशा में कार्य तेज होने की उम्मीद है।


