मध्य पूर्व में लगातार बढ़ते तनाव के बीच ईरान के एक वरिष्ठ राजनयिक के बयान ने वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। मुंबई में तैनात ईरान के काउंसल जनरल सईद रजा मोसयेब मोतलाघ ने एक इंटरव्यू में अमेरिका और इजरायल पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि ये दोनों देश क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति को बढ़ावा दे रहे हैं। उनके इस बयान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है।
सईद रजा मोसयेब मोतलाघ ने न्यूज एजेंसी को दिए अपने साक्षात्कार में भारत, रूस और चीन की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों के जोखिम के बावजूद शांति और स्थिरता को प्राथमिकता दी है। उनके अनुसार, वैश्विक स्तर पर संतुलन बनाए रखने में इन देशों की भूमिका बेहद अहम रही है और इनकी कूटनीतिक नीति संघर्ष की बजाय समाधान की दिशा में केंद्रित रही है।
इसके विपरीत उन्होंने अमेरिका और इजरायल पर निशाना साधते हुए कहा कि ये देश समस्याओं के समाधान के बजाय हिंसा और सैन्य कार्रवाई को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि विडंबना यह है कि जो देश खुद को वैश्विक शांति का पक्षधर बताते हैं, वही आज हत्या और सैन्य कार्रवाई को समाधान के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक इस तरह की नीतियां जारी रहेंगी, दुनिया को लगातार संघर्ष और अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा।
इसी बीच मसूद पेजेशकिया ने भी अमेरिका के साथ संभावित समझौते को लेकर महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए अमेरिका को अपनी “तानाशाही” वाली नीति को छोड़ना होगा। पेजेशकिया के अनुसार, किसी भी सार्थक समझौते के लिए यह जरूरी है कि अमेरिका ईरान की संप्रभुता और उसके लोगों के अधिकारों का सम्मान करे। उनका यह बयान इस ओर इशारा करता है कि तेहरान कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार है, बशर्ते शर्तें समानता और सम्मान पर आधारित हों।
दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाया है। हाल ही में दिए अपने बयान में उन्होंने कहा कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए और यदि वह बातचीत के लिए वापस आता है तो यह एक सकारात्मक कदम होगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि ईरान बातचीत के लिए आगे नहीं आता है, तो अमेरिका को इसकी ज्यादा चिंता नहीं है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि युद्ध के बाद ईरान की स्थिति काफी कमजोर हो चुकी है, जो उनके सख्त रुख को दर्शाता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मध्य पूर्व में जमीनी हालात भी चिंताजनक बने हुए हैं। विशेष रूप से लेबनान में स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। सीजफायर के बावजूद इजरायल द्वारा हमले जारी रहने की खबरें सामने आ रही हैं। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 2 मार्च के बाद से अब तक इजरायली हमलों में 2055 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 6588 से अधिक लोग घायल हुए हैं। केवल रविवार को ही 35 लोगों की जान चली गई, जो इस संघर्ष की गंभीरता को दर्शाता है।
मध्य पूर्व में जारी यह तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। तेल आपूर्ति, व्यापारिक मार्ग और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। ऐसे में ईरान के राजदूत का यह बयान वैश्विक कूटनीति में नई बहस को जन्म दे सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में सभी प्रमुख देशों को संयम और संवाद का रास्ता अपनाना होगा, अन्यथा यह संघर्ष और अधिक गहरा सकता है। भारत, रूस और चीन जैसे देशों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि ये देश वैश्विक मंच पर संतुलन बनाने की क्षमता रखते हैं और शांति स्थापना में अहम योगदान दे सकते हैं।


