राजस्थान की राजनीति में इन दिनों बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार तेज होता जा रहा है। इसी क्रम में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बार फिर राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। जयपुर स्थित अपने सरकारी आवास 49 सिविल लाइंस पर मीडिया से बातचीत के दौरान गहलोत ने सरकार को ‘संवेदनहीन’ करार देते हुए कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वर्तमान शासन में आम जनता, विशेष रूप से बुजुर्गों, दिव्यांगों और कर्मचारियों की समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
गहलोत ने अपने बयान में प्रधानमंत्री मोदी का भी जिक्र करते हुए कहा कि दुर्भाग्य से न तो केंद्र स्तर पर विपक्ष की बातों को महत्व दिया जा रहा है और न ही राज्य स्तर पर जनता की समस्याओं को गंभीरता से लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन आज उसकी आवाज को अनदेखा किया जा रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी सोशल मीडिया पहल ‘इंतजारशास्त्र’ का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह कोई राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने का एक सकारात्मक माध्यम है। गहलोत के अनुसार, अगर किसी क्षेत्र में कॉलेज की इमारत बनकर तैयार है लेकिन वहां पढ़ाई शुरू नहीं हो रही, तो इस मुद्दे को उठाना सरकार के लिए एक फीडबैक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष की बातों में सच्चाई है, तो सरकार को उसमें सुधार करना चाहिए, अन्यथा उसे नजरअंदाज किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में विपक्ष की किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए गहलोत ने वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस समय आर्थिक रूप से दबाव में है, इसके बावजूद बड़े पैमाने पर फिजूलखर्ची की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग कर भीड़ जुटाकर बड़े-बड़े सरकारी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिन पर भारी खर्च किया जा रहा है। गहलोत ने इसे ‘तमाशा’ करार देते हुए कहा कि जमीनी स्तर की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं, जबकि सरकार केवल दिखावे पर ध्यान दे रही है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर भी गहलोत ने गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि राजस्थान, जो कभी स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश के लिए एक मॉडल माना जाता था, आज वहां की स्थिति चिंताजनक हो गई है। विशेष रूप से Rajasthan Government Health Scheme (RGHS) की हालत पर उन्होंने सवाल उठाए। गहलोत के अनुसार, इस योजना के तहत दवा दुकानों का लगभग 1000 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है, जिसके कारण कई दुकानदारों ने दवाएं देना बंद कर दिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि निजी अस्पतालों ने भी भुगतान न मिलने के चलते मरीजों का इलाज करने से हाथ खींचना शुरू कर दिया है। इसका सीधा असर आम लोगों, विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स पर पड़ रहा है, जो इस योजना पर निर्भर हैं। गहलोत ने कहा कि अब इन लोगों को अपनी जेब से इलाज का खर्च उठाना पड़ रहा है, जो उनके लिए एक बड़ी समस्या बन गई है।
पेंशन व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने सरकार को घेरा। गहलोत ने आरोप लगाया कि बुजुर्गों, दिव्यांगों और विधवाओं की पेंशन तीन से चार महीने से लंबित है। उन्होंने इसे सरकार की संवेदनहीनता का उदाहरण बताते हुए कहा कि जिन लोगों को सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत होती है, उन्हीं को नजरअंदाज किया जा रहा है। उनके अनुसार, यह स्थिति सामाजिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व पर टिप्पणी करते हुए गहलोत ने कहा कि यदि सरकार चाहती, तो राजस्थान के स्वास्थ्य मॉडल को और मजबूत कर सकती थी। उन्होंने याद दिलाया कि उनके कार्यकाल में इस मॉडल की देशभर में सराहना होती थी और कई राज्य इसे अपनाने की कोशिश कर रहे थे। गहलोत के अनुसार, वर्तमान सरकार के पास इस मॉडल को आगे बढ़ाने का अवसर था, लेकिन इसके बजाय इसे कमजोर कर दिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार के फैसलों का असर आम लोगों पर पड़ रहा है, जबकि जनप्रतिनिधियों को कई सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं। गहलोत ने व्यंग्य करते हुए कहा कि विधायकों को तो मुफ्त इलाज की सुविधा मिल जाती है, लेकिन आम कर्मचारी और पत्रकार इलाज के लिए परेशान हो रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गहलोत का यह आक्रामक रुख आगामी राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भी देखा जा सकता है। ‘इंतजारशास्त्र’ जैसे अभियानों के जरिए वे लगातार सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा भी इन आरोपों का जवाब देने में पीछे नहीं है, जिससे राज्य की राजनीति में टकराव और बढ़ता नजर आ रहा है।


