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इस्लामाबाद वार्ता में नया मोड़: ईरान ने लेबनान को बनाया शर्त

इस्लामाबाद वार्ता में नया मोड़: ईरान ने लेबनान को बनाया शर्त

इस्लामाबाद में जारी ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर वार्ता ने उस समय नया और अहम मोड़ ले लिया, जब तेहरान से आए एक बयान ने पूरी बातचीत की दिशा को बदल दिया। पाकिस्तान की राजधानी में स्थित Serena Hotel Islamabad में दोनों देशों के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल आमने-सामने हैं, लेकिन अब यह वार्ता केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह गई है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस समझौते को व्यापक क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में देख रहा है, जिसमें लेबनान और वहां सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह भी शामिल हैं।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बगाई ने बयान देते हुए कहा कि लेबनान में सीजफायर को भी इस संभावित समझौते का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए। इस बयान ने न केवल अमेरिका बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। पाकिस्तान की ओर से भी इस बात की पुष्टि की गई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि इस्लामाबाद में चल रही बातचीत अब बहुस्तरीय और जटिल हो चुकी है।

दरअसल, ईरान की यह रणनीति उसके क्षेत्रीय हितों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। यह साफ संकेत है कि तेहरान केवल अपने खिलाफ हो रही सैन्य कार्रवाइयों को रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने सहयोगियों की सुरक्षा को भी इस समझौते में शामिल करना चाहता है। लेबनान में सक्रिय हिज्बुल्लाह, जिसे ईरान का करीबी सहयोगी माना जाता है, इस पूरी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है।

ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस्लामाबाद में मौजूद ईरानी प्रतिनिधिमंडल लगातार हिज्बुल्लाह के संपर्क में है और वार्ता के हर महत्वपूर्ण पहलू पर उनसे चर्चा कर रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईरान किसी भी निर्णय को एकतरफा नहीं लेना चाहता, बल्कि अपने सहयोगियों के साथ समन्वय बनाए रखते हुए आगे बढ़ रहा है। इस रणनीति से अमेरिका के सामने चुनौती और बढ़ गई है, क्योंकि वह अब केवल ईरान से ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े क्षेत्रीय समीकरणों से भी जूझ रहा है।

इस वार्ता से एक दिन पहले ही ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भी संकेत दे दिए थे कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा होगा। उन्होंने लेबनान में ईरानी राजदूत से बातचीत के दौरान यह स्पष्ट कर दिया था कि अमेरिका को प्रस्तावित दो सप्ताह के सीजफायर की शर्तों को पूरी तरह स्वीकार करना होगा, जिसमें लेबनान की स्थिति भी शामिल है। इस बयान के बाद से ही यह माना जा रहा था कि इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता में यह मुद्दा प्रमुख रहेगा।

वार्ता में शामिल प्रतिनिधिमंडलों की बात करें तो अमेरिका की ओर से नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, जबकि ईरान की तरफ से संसद स्पीकर मोहम्मद बाकर कालीबाफ नेतृत्व कर रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद हैं। पाकिस्तान की ओर से गृह मंत्री मोहसिन नकवी और विदेश मंत्री इशाक डार इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं।

इस्लामाबाद में हो रही यह वार्ता केवल कूटनीतिक बातचीत नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक और राजनीतिक समीकरण भी जुड़े हुए हैं। ईरान द्वारा लेबनान को इस समझौते में शामिल करने की मांग ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। अमेरिका का मानना है कि लेबनान और ईरान दो अलग-अलग मुद्दे हैं, जबकि ईरान दोनों को एक ही संदर्भ में देख रहा है। यही मतभेद इस वार्ता की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।

इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच जारी संघर्ष भी इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। इजराइल लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखना चाहता है, जबकि ईरान इस पर रोक लगाने की शर्त रख रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि अगर इस मुद्दे पर सहमति नहीं बनती है, तो सीजफायर वार्ता का सफल होना मुश्किल हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस वार्ता के शुरुआती 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण हैं। कुल 15 दिनों की बातचीत की समयसीमा तय की गई है, लेकिन शुरुआती दौर में ही अगर सहमति के संकेत नहीं मिलते हैं, तो आगे की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं और किसी भी तरह का समझौता करने से पहले सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस्लामाबाद में हो रही बातचीत केवल दो देशों के बीच का मामला नहीं रह गई है। यह अब एक व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दा बन चुकी है, जिसमें कई देशों और संगठनों के हित जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका और ईरान अपने मतभेदों को दूर कर पाते हैं या यह वार्ता भी पिछले प्रयासों की तरह निष्फल साबित होती है।

कुल मिलाकर, इस्लामाबाद में चल रही यह सीजफायर वार्ता वैश्विक राजनीति के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकती है। ईरान की नई शर्त ने यह साफ कर दिया है कि वह किसी भी समझौते को अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप ही स्वीकार करेगा, भले ही इसके लिए वार्ता लंबी और जटिल क्यों न हो जाए।

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