राजस्थान की शिक्षानगरी के रूप में पहचाने जाने वाले सीकर में विकास की रफ्तार इन दिनों एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक दस्तावेज के अभाव में थमी हुई नजर आ रही है। स्वायत्त शासन विभाग के तमाम दावों के बावजूद शहर को पिछले दो वर्षों से नए मास्टर प्लान की सौगात नहीं मिल सकी है। स्थिति यह है कि प्रारूप जारी होने के बाद भी यह योजना सियासी और प्रशासनिक उलझनों में फंसी हुई है, जिससे न केवल शहर का नियोजित विकास प्रभावित हो रहा है, बल्कि आम नागरिकों और निवेशकों के सामने भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।
मास्टर प्लान किसी भी शहर के विकास की आधारशिला होता है, जिसमें भविष्य की बसावट, व्यावसायिक गतिविधियों, यातायात व्यवस्था और बुनियादी ढांचे का खाका तैयार किया जाता है। लेकिन सीकर में यही महत्वपूर्ण दस्तावेज अब तक अंतिम रूप नहीं ले सका है। विभाग ने पहले पुराने मास्टर प्लान को निरस्त करने की बात कही और फिर उसमें संशोधन का संकेत दिया, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है। इस देरी ने शहरवासियों के बीच चिंता और असमंजस दोनों को बढ़ा दिया है।
स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि वे मौजूदा प्रारूप के आधार पर अपने निर्माण या व्यावसायिक प्रोजेक्ट शुरू करते हैं और बाद में उसमें बदलाव कर दिया जाता है, तो उनकी निवेशित पूंजी का क्या होगा और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। यही कारण है कि कई लोग अपने प्रोजेक्ट्स को शुरू करने से हिचक रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर विभिन्न सामाजिक और व्यापारिक संगठनों ने प्रशासन को कई बार ज्ञापन भी सौंपे हैं, लेकिन समस्या का समाधान अब तक फाइलों से बाहर नहीं आ पाया है।
दरअसल, इस मास्टर प्लान की कहानी पिछली सरकार के समय से शुरू होती है। उस दौरान योजना तैयार कर ली गई थी, लेकिन विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने के कारण इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सका। इसके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और मामला नई सरकार के पास पहुंचा। इस दौरान जब यह मुद्दा विधानसभा में उठा, तो शहरी विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने मास्टर प्लान में गंभीर अनियमितताओं की बात कहते हुए इसकी समीक्षा की जरूरत बताई।
करीब डेढ़ साल तक चली समीक्षा प्रक्रिया के बाद विभाग ने अंततः मास्टर प्लान का प्रारूप जारी किया, लेकिन इसके बाद भी विवाद थमने के बजाय और बढ़ गए। लोगों ने सुविधा क्षेत्र को शिफ्ट करने सहित कई मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। इन विरोधों के चलते विभाग को पहले मास्टर प्लान को निरस्त करने और फिर उसमें संशोधन करने की बात कहनी पड़ी, जिससे पूरा मामला और अधिक उलझ गया।
इस देरी का सीधा असर शहर के विकास पर पड़ रहा है। फतेहपुर रोड और धोद रोड जैसे प्रमुख क्षेत्रों के निवासी बताते हैं कि मास्टर प्लान के अभाव में जोनल प्लान तय नहीं हो पा रहा है, जिससे व्यावसायिक गतिविधियां ठप पड़ी हैं। निवेशक और व्यापारी अपने प्रोजेक्ट्स शुरू करने से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें भविष्य की स्पष्ट दिशा नहीं मिल पा रही है। यह स्थिति न केवल आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर रही है, बल्कि रोजगार के अवसरों पर भी असर डाल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मास्टर प्लान की अनुपस्थिति में शहर में अनियोजित तरीके से बसावट तेजी से बढ़ रही है। समीक्षा के दौरान यह सामने आया है कि शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित हो रहे सीकर के आसपास के क्षेत्रों में बाईपास और गांवों को जोड़ने वाली सड़कों के किनारे अनियोजित निर्माण हो रहा है। इससे न केवल यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि भविष्य में आधारभूत सुविधाओं की योजना बनाना भी कठिन हो जाएगा। इसके अलावा यह भी सामने आया कि बाईपास का निर्माण प्रस्तावित एलाइनमेंट के अनुसार नहीं हुआ है, जो शहरी नियोजन के लिहाज से एक गंभीर मुद्दा है।
टॉपिक एक्सपर्ट इंजीनियर दीपक पारीक का मानना है कि किसी भी शहर के लिए मास्टर प्लान अत्यंत आवश्यक होता है और इसके बिना नियोजित विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। उनका कहना है कि यदि विभाग को किसी तरह की त्रुटि नजर आती है, तो उसका भौतिक सत्यापन कर सुधार किया जा सकता है, लेकिन योजना को लंबे समय तक लंबित रखना शहर के विकास के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।


