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मत्स्य यूनिवर्सिटी भर्ती पर राज्यपाल का बड़ा बयान

मत्स्य यूनिवर्सिटी भर्ती पर राज्यपाल का बड़ा बयान

राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जब राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने मत्स्य यूनिवर्सिटी में हुई पुरानी भर्तियों की खामियों पर खुलकर नाराजगी जाहिर की। गुरुवार को आयोजित दीक्षांत समारोह के मंच से राज्यपाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि विश्वविद्यालयों में इस तरह की अनियमितताएं जारी रहीं, तो ये संस्थान भविष्य में शिक्षा के केंद्र नहीं बल्कि ‘होटल’ बनकर रह जाएंगे।

दीक्षांत समारोह के दौरान राज्यपाल का भाषण केवल औपचारिक नहीं रहा, बल्कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था के उन पहलुओं को उजागर किया, जिन पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। उन्होंने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और मनमर्जी से अंक देने की प्रवृत्ति को गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं न केवल योग्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय करती हैं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाती हैं।

राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. रमन कुमार दवे का नाम लेते हुए कहा कि उनके कार्यकाल से पहले हुई कुछ भर्तियों में गंभीर गड़बड़ियां सामने आई थीं। उन्होंने कहा कि उन्हें यह अच्छी तरह याद है कि उस समय कुछ लोगों को मनमर्जी के अंक देकर चयनित किया गया, जबकि अधिक योग्य अभ्यर्थी बाहर रह गए। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि इस तरह की अनियमितताओं को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा।

अपने संबोधन में राज्यपाल ने विस्तार से बताया कि भर्ती प्रक्रिया में कैसे कुछ लोगों की टीम इंटरव्यू लेकर अंक देती है और उसी आधार पर चयन होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 30 अंकों के इंटरव्यू में कुछ अभ्यर्थियों को मात्र 8 या 9 अंक दिए गए, जबकि कुछ को 27 से 30 अंक तक दिए गए, जिससे चयन प्रक्रिया प्रभावित हुई। उन्होंने इसे पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण और अनुचित बताते हुए कहा कि ऐसी प्रणाली को समाप्त करना बेहद जरूरी है।

राज्यपाल ने केवल भर्ती प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि फर्जी डिग्री के मुद्दे पर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि निजी विश्वविद्यालयों द्वारा दी जा रही फर्जी डिग्रियों पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए। उनके अनुसार, यदि ऐसे संस्थानों को बंद कर दिया जाए, तो कई निवेशकों को विश्वविद्यालय की जगह होटल चलाना पड़ेगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा के नाम पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य से जुड़ा होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान में विश्वविद्यालयों की संख्या आवश्यकता से अधिक हो गई है। उन्होंने बताया कि लगभग 8 करोड़ की आबादी वाले राज्य में 52 विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं, जिनमें 31 सरकारी विश्वविद्यालय शामिल हैं। तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में, जहां जनसंख्या अधिक है, वहां विश्वविद्यालयों की संख्या इससे काफी कम है। उनके अनुसार, राजस्थान में बड़ी संख्या में बाहरी छात्र इसलिए भी आते हैं क्योंकि यहां पास होने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है, लेकिन यह स्थिति शिक्षा की गुणवत्ता के लिए चुनौती बन सकती है।

फर्जी डिग्री के खतरे को समझाते हुए राज्यपाल ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति नकली डिग्री लेकर डॉक्टर बन जाता है, तो वह मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर सकता है। उन्होंने बताया कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें फर्जी डिग्री धारकों को जेल भी जाना पड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी और दोषियों को कानून के दायरे में लाया जाएगा।

राज्यपाल ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि केवल डिग्री हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके पास बौद्धिक क्षमता और व्यावहारिक ज्ञान भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक कौशल और सोच विकसित करना होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए सुंदर पिचई का उल्लेख किया और कहा कि भारत को ऐसे प्रतिभाशाली युवाओं की जरूरत है, जो वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकें।

इस अवसर पर नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने राज्यपाल की कार्यशैली की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने प्रदेशभर में जाकर जनता की समस्याओं को समझने का प्रयास किया है। उन्होंने वर्तमान समय को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों को इस दिशा में नए कोर्स और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि युवा भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकें।

कार्यक्रम के दौरान दीक्षांत समारोह में कुछ असामान्य स्थिति भी देखने को मिली, जब निर्धारित छात्रों में से 17 छात्र-छात्राएं समारोह में शामिल नहीं हुए। प्रोटोकॉल के कारण उनके नाम सूची से हटा दिए गए, हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया कि वे अपने संबंधित विभाग से डिग्री और मेडल प्राप्त कर सकते हैं।

पूरे मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो वर्ष 2018 में पूर्व कुलगुरु भरत सिंह के कार्यकाल में 23 पदों पर भर्ती को लेकर विवाद सामने आया था। इसमें क्लर्क, सहायक कर्मी, सहायक रजिस्ट्रार और लीगल एडवाइजर के पद शामिल थे। इस भर्ती में पक्षपात के आरोप लगते हुए शिकायतें संभागीय आयुक्त, राजभवन, एसीबी और पीएमओ तक पहुंची थीं। इसके अलावा वर्ष 2025 में प्रोफेसर पदों की भर्ती को लेकर भी विवाद हुआ, जिसके चलते वह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

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