मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है। पिछले एक महीने से अधिक समय से चल रहे इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और सप्लाई चेन को प्रभावित किया है, जिससे भारतीय ऑटो कंपनियों के लिए एक्सपोर्ट के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ब्रोकरेज फर्म Antique Stock Broking की ताजा रिपोर्ट में इस बात का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि मिडिल ईस्ट में यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल एक्सपोर्ट पर पड़ेगा। पश्चिम एशिया भारतीय ऑटो कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार रहा है, जहां से बड़ी मात्रा में वाहनों और ऑटो कंपोनेंट्स का निर्यात किया जाता है। लेकिन वर्तमान स्थिति में समुद्री मार्गों में बाधा, बढ़ते फ्रेट रेट और कमोडिटी की कीमतों में तेजी ने इस व्यापार को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शिपिंग लागत में वृद्धि और ट्रांजिट टाइम बढ़ने के कारण कंपनियों के लिए समय पर डिलीवरी करना मुश्किल हो सकता है। इससे न केवल निर्यात की मात्रा घट सकती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा पर भी असर पड़ सकता है। सप्लाई चेन में आ रही बाधाएं विशेष रूप से छोटे और मझोले सप्लायर्स के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
हालांकि, इन वैश्विक चुनौतियों के बीच घरेलू बाजार में ऑटो सेक्टर का प्रदर्शन अभी मजबूत बना हुआ है। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में करीब 16.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस बात का संकेत है कि देश के भीतर मांग अभी भी स्थिर है। यह वृद्धि उद्योग के लिए राहत का संकेत है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां नहीं सुधरीं, तो इसका असर धीरे-धीरे घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि इस तरह के जियो-पॉलिटिकल तनाव के बीच ऑटो कंपनियों को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। कंपनियां ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और सप्लाई चेन को अधिक लचीला बनाने पर ध्यान दे सकती हैं। इसके अलावा, वैकल्पिक बाजारों की तलाश और उत्पादन प्रक्रिया में सुधार जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं, ताकि जोखिम को कम किया जा सके।
विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि बड़े ऑटो निर्माता यानी OEMs पर इस संकट का असर सीमित रह सकता है, क्योंकि उनके पास संसाधनों और नेटवर्क की बेहतर उपलब्धता होती है। लेकिन टियर-2 और टियर-3 सप्लायर्स के लिए स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि वे सीमित संसाधनों के साथ काम करते हैं और सप्लाई चेन में छोटे बदलाव भी उनके उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके बावजूद, ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि आने वाले 4 से 6 तिमाहियों तक ऑटो सेक्टर में मांग मजबूत बनी रह सकती है और वर्ष 2026 तक ग्रोथ का सिलसिला जारी रहेगा। हालांकि 2027-28 के दौरान यह ग्रोथ सामान्य स्तर पर आ सकती है। यह अनुमान इस आधार पर लगाया गया है कि घरेलू बाजार में उपभोक्ता मांग अभी स्थिर है और आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे मजबूत हो रही हैं।
यदि हालिया बिक्री के आंकड़ों पर नजर डालें, तो मार्च 2026 में कई प्रमुख ऑटो कंपनियों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। Tata Motors ने 28 प्रतिशत, Mahindra & Mahindra ने 25 प्रतिशत, Maruti Suzuki ने 11 प्रतिशत और Hyundai Motor India ने 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि घरेलू बाजार में अभी भी सकारात्मक रुझान बना हुआ है।
कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी स्थिति उत्साहजनक रही है। इस श्रेणी में वित्त वर्ष 2026 के दौरान 12 से 13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। Volvo Eicher Commercial Vehicles, Tata Motors और Ashok Leyland ने क्रमशः 14 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 5.5 प्रतिशत की ग्रोथ हासिल की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में गतिविधियां बढ़ रही हैं।
घरेलू पैसेंजर व्हीकल बाजार की बात करें तो मार्च 2026 में कुल बिक्री करीब 4.5 लाख यूनिट्स रही। Maruti Suzuki की बिक्री 1.66 लाख यूनिट्स तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत अधिक है। इसी तरह Tata Motors और Mahindra & Mahindra ने भी मजबूत वृद्धि दर्ज की, जो बाजार में उनकी बढ़ती हिस्सेदारी को दर्शाता है।


