राजस्थान के सीमावर्ती और विशाल क्षेत्रफल वाले जैसलमेर जिले में एक बार फिर प्रशासनिक बदलाव हुआ है। राज्य सरकार ने आईएएस अधिकारी अनुपमा जोरवाल को जिले का नया कलेक्टर नियुक्त किया है। अनुपमा जोरवाल जैसलमेर की 68वीं जिला कलेक्टर होंगी और खास बात यह है कि वह जिले की केवल पांचवीं महिला कलेक्टर के रूप में जिम्मेदारी संभालेंगी। इससे पहले भी वह यहां करीब ढाई माह तक कलेक्टर रह चुकी हैं।
महिला नेतृत्व पर भरोसा, लेकिन कम कार्यकाल
जैसलमेर जैसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण जिले में महिलाओं को नेतृत्व सौंपना राज्य सरकार के भरोसे को दर्शाता है। इससे पहले शुचि त्यागी, डॉ. प्रतिभा सिंह और टीना डाबी जैसी महिला अधिकारी भी यहां कलेक्टर रह चुकी हैं। हालांकि आंकड़े यह भी बताते हैं कि इन महिला अधिकारियों को अपेक्षाकृत कम समय मिला। केवल शुचि त्यागी ही एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर सकीं, जबकि अन्य अधिकारियों का कार्यकाल छह माह से भी कम रहा।
प्रतापसिंह के बाद फिर बदलाव
हाल ही में पूर्व कलेक्टर प्रताप सिंह का तबादला किया गया, जिनका कार्यकाल लगभग सवा दो साल रहा। यह जैसलमेर के इतिहास में लंबे कार्यकालों में से एक माना जाता है। अब करीब आठ साल बाद अनुपमा जोरवाल की वापसी इस जिले में हुई है, जिससे प्रशासनिक अनुभव का लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
रेगिस्तानी जिले की प्रशासनिक चुनौतियां
जैसलमेर भौगोलिक दृष्टि से देश के सबसे बड़े जिलों में गिना जाता है। यहां का क्षेत्रफल विशाल होने के साथ-साथ आबादी दूर-दराज की ढाणियों में फैली हुई है। ऐसे में किसी भी कलेक्टर के लिए पूरे जिले की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझना ही एक बड़ी चुनौती होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस जिले को समझने में ही तीन से चार महीने का समय लग जाता है। यही कारण है कि कम अवधि में बार-बार प्रशासनिक बदलाव से कामकाज की निरंतरता प्रभावित होती है।
अनुपमा जोरवाल का पिछला कार्यकाल
अनुपमा जोरवाल वर्ष 2018 में भी जैसलमेर की कलेक्टर रह चुकी हैं। उस समय उनका कार्यकाल केवल ढाई माह का रहा, जो जिले के इतिहास में दूसरे सबसे कम समय तक रहने वाले कलेक्टरों में शामिल है। इससे पहले एचसी पांडे का कार्यकाल महज 20 दिन का रहा था, जो सबसे कम माना जाता है।
जैसलमेर में कलेक्टरों का औसत कार्यकाल
जिले में कलेक्टर का औसत कार्यकाल करीब एक वर्ष माना जाता है, लेकिन कई मामलों में यह अवधि काफी कम रही है। कुछ अधिकारियों को मात्र चार से छह महीने तक ही यहां काम करने का मौका मिला, जबकि कुछ ने लंबा कार्यकाल भी पूरा किया। डॉ. ललित के. पंवार का कार्यकाल सवा तीन साल का रहा, जो अब तक सबसे लंबा माना जाता है। इसी तरह प्रतापसिंह, सज्जननाथ मोदी और अन्य अधिकारियों ने भी अपेक्षाकृत लंबा समय इस जिले में बिताया।
अनुभव और स्थिरता की जरूरत
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि जैसलमेर जैसे जिले में प्रभावी कामकाज के लिए स्थिरता बेहद जरूरी है। बार-बार कलेक्टर बदलने से योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा आती है और क्षेत्रीय समस्याओं की गहराई से समझ विकसित नहीं हो पाती। महिला अधिकारियों को अवसर देने के साथ-साथ उन्हें पर्याप्त समय देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, ताकि वे अपनी प्रशासनिक क्षमता का पूरा उपयोग कर सकें।


