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मिडिल ईस्ट तनाव से राजस्थान की फसलें संकट में

मिडिल ईस्ट तनाव से राजस्थान की फसलें संकट में

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने अब राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। United States, Israel और Iran के बीच बढ़ते तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हुआ है, जिससे मरुधरा की प्रमुख निर्यात आधारित फसलें संकट में आ गई हैं। राज्य के प्रमुख कृषि उत्पाद जैसे नागौर का जीरा, जोधपुर का ग्वार गम और हाड़ौती का बासमती चावल अब निर्यात बाधित होने के कारण दबाव में हैं। बंदरगाहों पर बड़ी मात्रा में माल अटका हुआ है, जिससे किसानों और व्यापारियों दोनों की चिंता बढ़ गई है।

ग्वार गम की मांग घटी, कीमतों में गिरावट

राजस्थान देश का सबसे बड़ा ग्वार उत्पादक राज्य है, जहां जोधपुर, नागौर, बीकानेर और गंगानगर इसके प्रमुख उत्पादन केंद्र हैं। ग्वार से बनने वाला गम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस उद्योग में ड्रिलिंग के लिए उपयोग किया जाता है।

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण तेल उत्पादन और आपूर्ति में अस्थिरता आई है, जिससे ग्वार गम की मांग में गिरावट देखी जा रही है। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है और बाजार में ग्वार गम के भाव में प्रति क्विंटल करीब 2000 रुपए तक की गिरावट दर्ज की गई है। व्यापारियों के अनुसार, निर्यात बंद होने से बाजार में स्टॉक बढ़ रहा है और मांग कमजोर पड़ रही है।

निर्यात पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती

ग्वार गम, जीरा और अन्य मसाला फसलें मुख्य रूप से निर्यात पर आधारित हैं। इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती हैं। ऐसे में जब वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान के किसानों की आय का बड़ा हिस्सा इन फसलों के निर्यात से जुड़ा है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां उनके लिए जोखिम का कारण बनती जा रही हैं।

जीरा और मसाला फसलों पर भी असर

नागौर और आसपास के क्षेत्र जीरा, धनिया और मैथी जैसी मसाला फसलों के लिए प्रसिद्ध हैं। इनका निर्यात खाड़ी देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में किया जाता है।

लेकिन वर्तमान स्थिति में बंदरगाहों पर माल फंसा होने और निर्यात घटने के कारण इन फसलों की मांग में कमी आई है। मंडियों में आवक बढ़ने के साथ-साथ कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। बाड़मेर कृषि मंडी में जीरे के भाव में 15 से 20 रुपए प्रति किलो तक की गिरावट देखी गई है। इसके अलावा इसबगोल के दामों में भी 10 से 15 रुपए प्रति किलो तक की कमी आई है।

बासमती चावल के निर्यात पर असर

हाड़ौती क्षेत्र से होने वाले बासमती चावल के निर्यात पर भी इस संकट का असर पड़ा है। इस क्षेत्र से खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर चावल भेजा जाता है, लेकिन Iran की मौजूदा स्थिति के कारण यह निर्यात पूरी तरह ठप हो गया है। ईरान के Bandar Abbas Port के माध्यम से ईरान और अफगानिस्तान जाने वाली खेप पिछले एक महीने से अटकी हुई है। जानकारी के अनुसार, लगभग चार लाख टन चावल के करीब 3000 कंटेनर बंदरगाहों पर खड़े हैं, जिससे निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा है।

निर्यातकों ने तलाशे नए बाजार

स्थिति को देखते हुए निर्यातकों ने अब अन्य देशों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। वे वैकल्पिक बाजारों में बासमती चावल भेजने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि नुकसान को कम किया जा सके। हालांकि, नए बाजारों में स्थापित होना आसान नहीं होता और इसमें समय लगता है, जिससे फिलहाल व्यापारियों और किसानों को आर्थिक दबाव झेलना पड़ रहा है।

किसानों और व्यापारियों की बढ़ी चिंता

ग्वार गम व्यापारी गोपीकिशन बंग के अनुसार, निर्यात ठप होने से बाजार में कीमतों में भारी गिरावट आई है, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि अगर जल्द ही अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य नहीं होते, तो यह संकट और गहरा सकता है। किसानों के सामने अपनी फसल का उचित मूल्य प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

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