पश्चिम एशिया में जारी संकट को लेकर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ‘दलाल’ टिप्पणी पर देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। इस बयान को लेकर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने इस टिप्पणी को न केवल अनुचित बताया, बल्कि इसे कूटनीतिक मर्यादाओं के खिलाफ भी करार दिया है।
सर्वदलीय बैठक में दिया गया बयान
पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा के लिए संसद परिसर में आयोजित सर्वदलीय बैठक के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि “हम दलाल राष्ट्र नहीं हैं।” यह टिप्पणी उस संदर्भ में की गई थी, जिसमें भारत की विदेश नीति और वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका पर चर्चा हो रही थी। हालांकि, इस बयान के सामने आते ही विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया और सरकार की भाषा तथा कूटनीतिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
गहलोत ने जताई कड़ी आपत्ति
अशोक गहलोत ने इस टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी विदेश मंत्री को इस प्रकार की भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह के शब्द किसी भी देश या वैश्विक मंच पर भारत की छवि को प्रभावित कर सकते हैं।
गहलोत ने स्पष्ट रूप से कहा कि “मैं समझता हूं कि कोई विदेश मंत्री किसी मुल्क के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यदि उनकी जुबान फिसलने से ऐसा हुआ है तो उन्हें खेद प्रकट करना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो इस बयान की देशभर में आलोचना होना स्वाभाविक है।
कूटनीतिक मर्यादा और वैश्विक छवि का सवाल
गहलोत ने अपने बयान में कूटनीतिक मर्यादाओं के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शब्दों का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है और इस तरह की टिप्पणी से भारत की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि “आप कैसे कह सकते हैं कि कोई दलाली कर रहा है? यदि देशों के बीच शांति स्थापित नहीं होगी और हिंसा जारी रहेगी, तो दुनिया किस दिशा में जाएगी?” उन्होंने वैश्विक अस्थिरता की ओर इशारा करते हुए यह भी कहा कि मौजूदा हालात कहीं तीसरे विश्व युद्ध की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं।
पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए सवाल
पश्चिम एशिया संकट में पाकिस्तान की संभावित मध्यस्थता की चर्चाओं पर भी अशोक गहलोत ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या स्थिति है, यह इतिहास में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने 1965 का भारत-पाक युद्ध और कारगिल युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि इन युद्धों में पाकिस्तान की स्थिति जगजाहिर है।
गहलोत ने आगे कहा कि भारत की तुलना में पाकिस्तान की स्थिति कहीं नहीं ठहरती और उसे किसी भी बड़े वैश्विक संकट में निर्णायक भूमिका निभाने योग्य नहीं माना जा सकता।
1971 युद्ध का उदाहरण
अपने तर्क को मजबूत करने के लिए गहलोत ने 1971 का भारत-पाक युद्ध का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने 90 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को गिरफ्तार किया था, जो देश की सैन्य और कूटनीतिक शक्ति का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि आज की परिस्थितियां उस दौर से अलग नजर आती हैं और यह बदलाव चिंताजनक है।
अंतरराष्ट्रीय हालात पर चिंता
गहलोत ने वैश्विक स्थिति को नाजुक बताते हुए कहा कि सरकार को समय रहते इस तरह के संकटों के लिए तैयार रहना चाहिए था। उन्होंने राहुल गांधी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि विपक्ष पहले ही ऐसे हालात को लेकर चेतावनी दे चुका था। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं और ऐसे में भारत को अपनी रणनीति को और मजबूत करना होगा।
मोदी-ट्रंप संबंधों पर टिप्पणी
गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ट्रंप का व्यवहार कभी दोस्ताना तो कभी आलोचनात्मक रहा है, जो समझ से परे है।
उन्होंने कहा कि “कभी ट्रंप मोदी को मित्र बताते हैं, तो कभी यह कहते हैं कि मोदी उन्हें खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। यहां तक कि वे यह दावा भी कर चुके हैं कि वे उनके राजनीतिक करियर को प्रभावित कर सकते हैं।” गहलोत ने इसे असामान्य और चिंताजनक बताते हुए कहा कि किसी भी देश के शीर्ष नेता के बारे में इस तरह की टिप्पणी करना दुर्लभ है।
वैश्विक घटनाओं का हवाला
गहलोत ने अपने बयान में अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया के हालात तेजी से बदल रहे हैं। उन्होंने वेनेजुएला में हुए घटनाक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी देश के राष्ट्रपति तक को असुरक्षित महसूस करना पड़े, तो यह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है।
सियासत तेज, बयान पर बढ़ा विवाद
विदेश मंत्री की टिप्पणी के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब राजनीतिक रूप से गहराता जा रहा है। जहां एक ओर सरकार इसे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का प्रतीक बता रही है, वहीं विपक्ष इसे भाषा की मर्यादा से जोड़कर सवाल उठा रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि संसद और राजनीतिक मंचों पर इस पर चर्चा जारी रहने की संभावना है। यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति, कूटनीतिक भाषा और वैश्विक छवि से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है।


