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स्वभाव देखकर गुरु बनाएं: इंद्रेश उपाध्याय का संदेश

स्वभाव देखकर गुरु बनाएं: इंद्रेश उपाध्याय का संदेश

राजस्थान के अलवर स्थित विजयनगर ग्राउंड में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन श्रद्धा और भक्ति का अनोखा संगम देखने को मिला। कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने अपने प्रवचन में जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए गुरु के महत्व, भक्ति के मार्ग और सामाजिक व्यवहार से जुड़ी गहरी बातें कहीं। कथा स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और पूरे वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता नजर आया।

गुरु चयन पर दिया विशेष संदेश

इंद्रेश उपाध्याय ने अपने प्रवचन में कहा कि जीवन में गुरु का होना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन गुरु का चयन केवल प्रभाव या लोकप्रियता देखकर नहीं करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आज के समय में लोग किसी व्यक्ति की भीड़, फॉलोवर्स और प्रसिद्धि से प्रभावित होकर उसे गुरु बना लेते हैं, जो कि उचित नहीं है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि गुरु का चयन उसके स्वभाव, आचरण और जीवन मूल्यों को देखकर करना चाहिए। सच्चा गुरु वही होता है जो अपने व्यवहार से मार्गदर्शन दे और जीवन को सही दिशा में ले जाए।

भक्त याकूब हुसैन का उल्लेख

कथा के दौरान इंद्रेश उपाध्याय ने अलवर के ही एक मुस्लिम भक्त याकूब हुसैन का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने उनके भक्ति भाव की सराहना करते हुए एक श्लोक भी सुनाया। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने बताया कि भक्ति किसी जाति या धर्म की सीमा में बंधी नहीं होती, बल्कि यह एक सार्वभौमिक भावना है जो हर व्यक्ति को ईश्वर से जोड़ती है।

भक्ति और जीवनशैली पर संदेश

प्रवचन के दौरान उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवनशैली से जुड़ा एक हल्का-फुल्का लेकिन महत्वपूर्ण संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि कथा सुनने के लिए बाइक और गाड़ियों का कम उपयोग करना चाहिए और संभव हो तो पैदल आना चाहिए। इससे न केवल स्वास्थ्य लाभ होगा बल्कि मन भी शांत रहेगा। उन्होंने हंसी-हंसी में कहा कि पैदल चलने से कढ़ी-कचौरी भी आसानी से पच जाएगी।

इंद्रेश उपाध्याय ने यह भी कहा कि आजकल लोग अत्यधिक भोजन कर लेते हैं, जिससे भजन-कीर्तन में भी उनकी आवाज नहीं निकलती। उन्होंने सलाह दी कि यदि व्यक्ति ठाकुर जी के सामने भजन, नृत्य और प्रार्थना कर लेता है, तो उसे दुनिया के सामने अपनी भावनाओं को साबित करने की आवश्यकता नहीं रहती।

विदेश और भारत की जीवनशैली पर विचार

उन्होंने अपने प्रवचन में विदेशों और भारत की जीवनशैली की तुलना करते हुए कहा कि विदेशों में भौतिक सुविधाएं अधिक हैं, जिससे लोग शारीरिक रूप से सुखी दिखाई देते हैं, लेकिन मानसिक शांति की कमी होती है। इसके विपरीत भारत के लोग आध्यात्मिकता से जुड़े रहते हैं, कथा सुनते हैं, तीर्थ यात्रा करते हैं और भजन-कीर्तन में भाग लेते हैं, जिससे उन्हें आंतरिक संतोष प्राप्त होता है।

तीर्थ यात्रा का सही तरीका

इंद्रेश उपाध्याय ने तीर्थ यात्रा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तीर्थ यात्रा हमेशा किसी आचार्य या ज्ञानी व्यक्ति के साथ करनी चाहिए। इससे यात्रा का वास्तविक आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई जगन्नाथ मंदिर पुरी की यात्रा करे तो किसी ब्रजवासी के साथ जाकर दर्शन करना चाहिए, जिससे भक्ति का वास्तविक भाव समझ में आता है।

भजन पर झूमे श्रद्धालु

कथा के दौरान ‘गोविंद मेरो, गोपाल मेरो’ भजन की धुन पर पूरा पंडाल भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालु भक्ति में डूबकर झूमने लगे और महिला-पुरुष सभी ने उत्साह के साथ नृत्य किया। इस दौरान पूरा वातावरण भक्ति और आनंद से भर गया, जहां हर व्यक्ति भगवान की भक्ति में लीन नजर आया।

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