राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। राज्य विधानसभा ने सोमवार को एक ऐसा विधेयक पारित किया, जिसके तहत पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों तक की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। लगभग तीन दशकों से लागू इस प्रावधान को अब खत्म कर दिया गया है, जिससे भविष्य में दो से अधिक बच्चे होने वाले लोग भी पंचायत चुनाव में उम्मीदवार बन सकेंगे।
सरकार अब इसी तरह का संशोधन शहरी निकायों के चुनावों के लिए भी करने की तैयारी में है। इसके लिए मंगलवार को विधानसभा में एक और विधेयक पेश कर पारित किए जाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस बदलाव के बावजूद राज्य की कई सरकारी सेवाओं, सहकारी संस्थाओं के चुनावों और विभिन्न योजनाओं में दो से अधिक बच्चों से जुड़े नियम अब भी लागू रहेंगे।
31 वर्षों से लागू था यह प्रावधान
पंचायत और शहरी निकाय चुनावों में दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने का नियम करीब 31 वर्ष पहले लागू किया गया था। इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करना था। इस नियम के तहत यदि किसी व्यक्ति के दो से अधिक बच्चे होते थे तो वह स्थानीय निकाय चुनाव में प्रत्याशी बनने के योग्य नहीं माना जाता था। अब विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद यह बाध्यता समाप्त हो गई है। इसका मतलब है कि भविष्य में पंचायत चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए बच्चों की संख्या से संबंधित कोई शर्त लागू नहीं होगी।
सरकारी भर्तियों में अभी भी लागू है नियम
हालांकि पंचायत चुनावों में यह प्रावधान समाप्त कर दिया गया है, लेकिन सरकारी सेवाओं में यह नियम अब भी प्रभावी है। राज्य की कई सरकारी भर्तियों में दो से अधिक बच्चे होने पर नियुक्ति में बाधा आ सकती है। यह नियम सफाई कर्मचारी से लेकर प्रदेश की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवाओं तक लागू है। पिछले लगभग 20 वर्षों से सरकारी नौकरियों में यह प्रावधान लागू किया गया है। इसके तहत यदि किसी अभ्यर्थी के दो से अधिक बच्चे होते हैं तो उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है।
इसके अलावा सहकारी संस्थाओं के चुनावों में भी दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्तियों के लिए प्रतिबंध बरकरार है। इस कारण पंचायत चुनावों में बदलाव के बावजूद अन्य क्षेत्रों में यह नियम फिलहाल लागू रहेगा।
कई सरकारी योजनाओं में भी तीसरे बच्चे पर रोक
राज्य और केंद्र सरकार की कई सामाजिक योजनाओं में भी दो से अधिक बच्चों से संबंधित शर्त लागू है। स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण से जुड़ी दस से अधिक योजनाओं में तीसरे बच्चे को लाभ नहीं दिया जाता है। इन योजनाओं का उद्देश्य परिवार नियोजन को बढ़ावा देना और छोटे परिवार की अवधारणा को प्रोत्साहित करना है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन नियमों का असर कई बार तीसरे बच्चे के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण पर भी पड़ता है।
मातृत्व और पोषण योजनाओं में सीमाएं
सरकार की कई योजनाओं में मातृत्व और बाल पोषण से जुड़ी सहायता केवल दो बच्चों तक ही सीमित है। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना में पहले बच्चे के लिए पांच हजार रुपए और दूसरे बच्चे के बेटी होने पर छह हजार रुपए की सहायता दी जाती है। इसी तरह मुख्यमंत्री मातृत्व पोषण योजना के तहत जनजातीय जिलों में दूसरी संतान के दौरान गर्भवती महिलाओं को पोषण सहायता दी जाती है। यह सहायता तीन किश्तों में कुल छह हजार रुपए तक प्रदान की जाती है, लेकिन यह भी दूसरी संतान तक ही सीमित रहती है।
बालिका और विवाह योजनाओं में भी सीमा
राज्य सरकार की कई योजनाएं बालिकाओं और महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़ी हैं, लेकिन इनमें भी लाभ की सीमा दो बच्चों तक ही रखी गई है। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग के परिवारों को दो बेटियों तक ही आर्थिक सहायता मिलती है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री राजश्री योजना और शुभ शक्ति योजना जैसी योजनाओं में भी लाभ एक या दो बेटियों तक सीमित है। इन योजनाओं के माध्यम से बालिका शिक्षा और महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं में भी प्रतिबंध
निर्माण श्रमिक शिक्षा एवं कौशल विकास योजना के तहत श्रमिकों के बच्चों को छात्रवृत्ति दी जाती है। इस योजना में दसवीं और बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को चार से छह हजार रुपए तक की छात्रवृत्ति मिलती है। हालांकि इसमें भी लाभार्थियों की संख्या सीमित रखी गई है। राजस्थान पत्रकार स्वास्थ्य योजना में भी परिवार के सदस्यों के लिए स्वास्थ्य बीमा की सुविधा दी जाती है। इसमें पति-पत्नी के साथ अधिकतम दो आश्रित बच्चों को ही शामिल किया जाता है।
नीति में बदलाव पर चर्चा
पंचायत चुनावों में दो बच्चों की बाध्यता समाप्त होने के बाद अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या अन्य क्षेत्रों में भी इस नियम की समीक्षा की जानी चाहिए। कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि यदि स्थानीय निकाय चुनावों में यह नियम हटाया गया है तो सरकारी नौकरियों और योजनाओं में भी इसे लेकर पुनर्विचार किया जा सकता है।


